सीमा आज़ाद की गिरफ्तारी : लोकतन्‍त्र का लबादा खूंटी पर, दमन का चाबुक हाथ में

ज़रूरी नहीं फ़ासीवाद केवल धर्म का चोला पहनकर ही आए, वह लोकतन्‍त्र का लबादा ओढ़कर भी आ सकता है। और ऐसा हो भी रहा है। चुनावों में कांग्रेस की जीत के बाद कई लोगों ने खुशी जाहिर की थी और उन्‍हें लगा था कि चुनावों ने फासिस्‍ट भाजपा को हाशिये पर धकेल दिया है। उस समय भी हमने इसी ब्‍लॉग पर लिखा था कि चुनावों में भाजपा की हार से ही फासीवाद की हार तय नहीं होती और यह कि हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि सेवानिवृत्त होकर ''बुद्धत्त्‍व'' प्राप्त करने के बाद पूर्व राष्ट्रपति वेंकटरमण ने भी यह वक्तव्य दिया था कि वर्तमान आर्थिक नीतियों को एक फासिस्ट राजनीतिक ढांचे में ही पूरी तरह लागू किया जा सकता है। अब परिस्थितियां अक्षरक्ष: इसे स‍ाबित कर रही हैं। एक तरफ़ तो कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार कल्‍याणकारी योजना के नाम पर जनता के बीच उसी से लूटी गई संपदा के टुकड़े फेंक रही है, तो दूसरी तरफ नक्‍सलवाद, आतंकवाद के खात्‍मे के नाम पर आम जनता और उसके हक की लड़ाई लड़ने वालों का दमन कर रही है उन्‍हें सलाखों के पीछे डाल रही है। पत्रकार सीमा आज़ाद की गिरफ्तारी भी इसी दमन की एक अगली कड़ी है। नक्‍सलवाद से पूरी तरह वैचारिक विरोध रखने वाले संगठन पीयूसीएल की सदस्‍य और पत्रकार सीमा आज़ाद की गिरफ्तारी अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता पर हमला तो है ही, साथ ही जनपक्षधर राजनीति करने वालों और जनता के पक्ष में संघर्ष करने वालों का मुंह बंद करने की कोशिश भी है। 'बर्बरता के विरुद्ध' सरकार के इस क़दम का विरोध करता है और पत्रकार सीमा आज़ाद की रिहाई की मांग करता है।


सीमा आज़ाद मानवाधिकार संस्था पी.यू.सी.एल. से सम्बद्ध हैं, साथ ही द्वैमासिक पत्रिका "दस्तक" की सम्पादक हैं और उनके पति विश्वविजय वामपन्थी रुझान वाले सामाजिक कार्यकर्ता हैं. अपनी पत्रिका "दस्तक" में सीमा लगातार मौजूदा जनविरोधी सरकार की मुखर आलोचना करती रही है. सीमा ने पत्रिका का सम्पादन करने के साथ-साथ सरकार के बहुत-से क़दमों का कच्चा-चिट्ठा खोलने वाली पुस्तिकाएं भी प्रकाशित की हैं. इनमें गंगा एक्सप्रेस-वे, कानपुर के कपड़ा उद्योग और नौगढ़ में पुलिसिया दमन से सम्बन्धित पुस्तिकाएं बहुत चर्चित रही हैं. हाल ही में, १९ जनवरी को सीमा ने गृह मन्त्री पी चिदम्बरम के कुख्यात "औपरेशन ग्रीनहण्ट" के खिलाफ़ लेखों का एक संग्रह प्रकाशित किया. ज़ाहिर है, इन सारी वजहों से सरकार की नज़र सीमा पर थी और ६ तारीख़ को पुलिस ने सीमा और विश्वविजय को गिरफ़्तार कर लिया और जैसा कि दसियों मामलों में देखा गया है उनसे झूठी बरामदगियां दिखा कर उन पर राजद्रोह का अभियोग लगा दिया.
हमारी तथाकथित लोकतांत्रिक व्यवस्था अपनी नीतियों के विरोधियों को कभी "आतंकवादी" और कभी "नक्सलवादी" या "माओवादी" घोषित करके जेल की सलाखों के पीछे ठूंसने का वही फ़र्रुख़ाबादी खेल खेलने लगी है. इस खेल में सब कुछ जायज़ है -- हर तरह का झूठ, हर तरह का फ़रेब और हर तरह का दमन. और इस फ़रेब में सरकार का सबसे बड़ा सहयोगी है हमारा बिका हुआ मीडिया. इसीलिए हैरत नहीं हुई कि सीमा की गिरफ़्तारी के बाद अख़बारों ने हर तरह की अतिरंजित सनसनीख़ेज़ ख़बरें छापीं कि ट्रक भर कर नक्सलवादी साहित्य बरामद हुआ है, कि सीमा माओवादियों की "डेनकीपर" (आश्रयदाता) थी.
इस संबंध में विस्‍तृत जानकारी के लिए देखें युवा पत्रकार विजय प्रताप का ब्‍लॉग नई पीढ़ी। (इस पोस्‍ट का कुछ अंश उनके ब्‍लॉग से ही लिया गया है)

8 comments:

Dr. Amar Jyoti said...

'वो बात सारे फ़साने में जिसका ज़िक्र न था
वो बात उनको बहुत नागवार गुज़री है।'
फ़ैज़

ali said...

डाक्टर अमर ज्योति से सहमत ! सीमा आज़ाद और उनके पति को जनपक्षधरता लिए प्रताड़ित किया जाना निंदनीय है !

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

यहां मैं आपके साथ. लेकिन आप वास्तव में मार्क्स को भी मानने वाले नहीं. आप तो प्रो इस्लामी हैं.

अशोक कुमार पाण्डेय said...

सही लिखा है आपने। पूरी तरह सहमत

और भारतीय नागरिक महोदय संघी गुण्डागर्दी का विरोध प्रो इस्लामिक होना नहीं होता। बुश की तरह 'या हमारे साथ या आतंकवादी' वाला डिक्टम मत चलाईये। हम और इस देश के मुसलमान भी भारतीय नागरिक हैं और हमें अपनी आवाज़ बुलन्द करने तथा असहमतियां दर्ज़ कराने का पूरा हक़ है।
तिरंगे की जगह भगवे और संविधान की जगह मनु स्मृति की मांग करने वाले संघियों से पूछिये की नागपुर मुख्यालय पर तिरंगा फहराने में उन्हें दो दशक क्यूं लग गये? क्यूं शाखा में भगवा झण्डा लगता है और हिटलर का कच्छा तथा मुसोलिनी की टोपी पहनी जाती है? यह भी पूछियेगा कि उनके आदर्श 'वीर' सावरकर क्यूं माफ़ी मांगकर, राजभक्ति का वचन देकर अण्डमान से रिहा हुए और क्यूं उसके पहले हिन्दू-मुस्लिम एकता की बात प्रथम स्वाधीनता समर में लिखने वाले बाद में हिन्दुत्व की बात कर अंग्रेज़ों के फूट डालो और राज करो नीति में सहायक साबित हुए?

लवली कुमारी said...

शर्मनाक..निंदनीय.

शहरोज़ said...

ज़रूरी नहीं फ़ासीवाद केवल धर्म का चोला पहनकर ही आए, वह लोकतन्‍त्र का लबादा ओढ़कर भी आ सकता है। और ऐसा हो भी रहा है।

shameem said...

manav adhikaro ka hanan loktantra ke liye koi nai baat nahi hai
apne janm se hi yah jan virodhi raha hai

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

फासीवाद लोकप्रिय विचार की वर्दी पहने आता है। सीमा आजाद की गिरफ्तारी पूरी तरह अनुचित और निराधार है। शासन की इस प्रवृत्ति का डटकर विरोध होना ही चाहिए।