चुनावों में कांग्रेस की जीत से फासीवाद का खतरा कम नहीं होगा

चुनावी धमाचौकड़ी खत्म हो चुकी है, और कांग्रेस के नेतृत्व में 79 मंत्रियों वाली सरकार भी अस्तिव में आ गई है। अपनी हार के बावजूद संसदीय वामपंथियों से लेकर कई बुद्धिजीवी तक इसे धर्मनिरपेक्ष ताकतों की जीत और सांप्रदायिक ताकतों की हार बता रहे हैं, जैसा कि पिछले आम चुनाव में कांग्रेस की जीत के बाद किया गया था। खुद कांग्रेस भी ''धर्मनिरपेक्ष'' ताकतों को जिताने के लिए जनता को धन्यवाद करती फिर रही है। लेकिन संसदीय चुनाव में कांग्रेस को बहुमत मिलना धर्मनिरपेक्ष ताकतों की जीत नहीं है। चुनावी खेल में कोई भी जीते, उससे फासीवाद को जुकाम तक नहीं होगा, उसका अंत या पतन तो दूर की बात है।

तमाम चुनावी मजमेबाजों और नेहरूवादी धर्मनिरपेक्षता के अनुयायियों की सतमेल खिचड़ी धार्मिक उग्रवादियों का मुकाबला नहीं कर सकती। 'सर्वधर्मसमभाव' के भजन-कीर्तनों से हम पुनत्थानवादी ताकतों के बढ़ते सामाजिक आधार और प्रभाव को रत्तीभर भी कम नहीं कर सकते। यह नहीं भूला जा सकता कि सभी चुनावी पार्टियां अपने-अपने वोट-बैंक के लिए जाति-धर्म के झगड़ों को तूल देती रही हैं, जनता को बांटती रही हैं और कूड़े-कचरे का वह ढेर इकट्ठा करती रही हैं जिस पर निरंकुश सामाजिक प्रवृत्तियों की तमाम विषबेल उगी हैं और हिन्दूं कट्टरपंथ का मानवभक्षी पौधा पनपा है।
ऐसे में
यह भूलना भी आत्‍मघाती होगा कि कांग्रेस ने ही पंजाब में धनी किसानों की पार्टी अकाली दल की धार्मिक भावनाओं पर कायम राजनीतिक आधार को खिसकाने के लिए भिण्डरांवाले को पैदा किया और जब वह उनके लिए ही भस्माओसुर बन गया तो उसे समाप्त करने के साथ ही पूरे पंजाब में आतंक राज कायम किया गया था। वी.पी. सिंह और चंद्रशेखर की सरकारों ने भी पंजाब की आंच पर अपनी चुनावी रोटियां सेंकने से अधिक कुछ नहीं किया। यही नहीं, इंदिरा गांधी-राजीव गांधी के समय से ही कांग्रेस भी 'हिंदू-कार्ड' खेलने की कोशिश करती रही है और इसकी सफलता में संदेह होने पर शाहबानो प्रकरण जैसे मामलों में मुस्लिम कट्टरपंथी ताकतों का तुष्टिकरण करके खोये हुए अल्पासंख्यक वोटों को फिर से अपनी झोली में डालने की कोशिशें भी करती रही है। अयोध्या में राम जन्मभूमि का ताला खुलने से लेकर अब तक की घटनाओं में केवल राजीव गांधी-नरसिंह राव की सरकारों की ही नहीं बल्कि वी.पी. सिंह-चंद्रशेखर की सरकारों की भी भूमिका भी रही है।

अब एक नजर संसदीय वामपंथ पर।
संसदीय वामपंथ के लिल्ली घोड़े पर सवार गत्ते की तलवारें भांजते ''रणबांकुरे'' साम्प्रदायिक फासीवाद-विरोधी अपनी तथाकथित प्रचारात्मक-आन्दोलनात्मक कार्रवाइयों को महानगरीय मध्यवर्ग के छोटे से हिस्सेर में सीमित रखते हैं। व्यापक मेहनतकश आबादी तो दूर की बात है, महानगरों से लेकर छोटे शहरों-कस्बों की निम्ने मध्यवर्गीय युवाओं तक सामने भी संसदीय वामपंथी दल फासीवाद-विरोधी संघर्ष की तैयारी का कार्यक्रम तो दूर, आम दिशा तक प्रस्तुरत नहीं कर सके हैं। इनकी रणनीति संसद में ''तीसरी ताकतों'' के भाजपा विरोध की मामा-गोटी खेलने से लेकर कांग्रेस को समर्थन देने तक ही मुख्यत: सीमित है।
पिछली सरकार में समर्थन के दौरान भी इन्होंने फासीवाद के खिलाफ जनता को जागृत-गोलबंद करने के लिए कुछ नहीं, सिवाय भाषणबाजी और बयानबाजी के। वैसे भी संसदीय वामपंथी सारी सीटों पर काबिज हो जाएं, तो भी फासीवाद खत्म नहीं हो जाएगा। फासीवादी ताकतें लगातार अपना काम कर रही हैं, भले ही इन आम चुनावों में हार से धार्मिक कट्टरपंथी थोड़ी देर के लिए शांत हो जाएं, लेकिन इस पराजय के चलते फासिस्ट ताकतें पहले से और ज्यामदा आक्रामक होकर भाषाई, धार्मिक अल्पलसंख्यों, दलितों, स्त्रियों के खिलाफ जहर उगलने का अपना घिनौना काम शुरू कर देंगी, ताकि अगले चुनावों में इस जहर से पोषित फसल काटी जा सके।
अब इन चुनावबाज पार्टियों से इतर बात की जाए, तो दरअसल, विश्व स्तर पर आर्थिक कट्टरपंथ या मूलतत्ववाद की वापसी ने राजनीतिक-सामाजिक स्तर पर भी कट्टरपंथ के लिए जमीन तैयार की है जिसकी तार्किक परिणति-फासीवादी धाराओं के नये सिरे से फलने-फूलने के रूप में सामने आ रही है।
हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि सेवानिवृत्त होकर ''बुद्धत्त्‍व'' प्राप्त करने के बाद पूर्व राष्ट्रपति वेंकटरमण ने भी यह वक्तव्य दिया था कि वर्तमान आर्थिक नीतियों को एक फासिस्ट राजनीतिक ढांचे में ही पूरी तरह लागू किया जा सकता है।

वैसे भी भारत हिन्दुनत्व वादी साम्प्रदायिक फासीवाद के प्रभाव-विस्तार का इतिहास भारतीय पूंजीवाद के पराभव और पतन के इतिहास का ही एक अध्यावय है। भारत में पूंजीवादी जनवाद और धर्मनिरपेक्षता का आधार शुरू से ही कमजोर रहा है तथा सांस्‍कृतिक पुरातनपंथ, अतीतोन्‍मुखता और सर्वसत्तावादी धार्मिक विचारों की एक सशक्त परमम्परा समाज में मौजूद रही है।
यहां पर कलेशी और प्रभात पटनायक की इस स्थापना का उल्लेख करना मौजूं होगा कि : फासीवादी ताकतें सत्ता में रहें न रहें, राजनीतिक और सामाजिक तानेबाने में उनकी उपस्थिति कष्टदायक हृदय-कैंसर के रूप में बनी रहेगी क्योंकि जहां फासीवाद के सत्ता में रहने की आवश्यकता साम्राज्यवाद या बड़ी पूंजी की नजर से फिलवक्त अधिक नहीं है, वहीं ये लोग फासीवाद को सिर पर तलवार की तरह लटकाये रखना भी आवश्यबक मानते हैं।
अंत में, साम्प्रदायिकता की समस्या का समाधान नेहरूवादी धर्मनिरपेक्षता या सर्वधर्मसमभाव के नारे में नहीं, बल्कि ऐसी सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था में होगा जिसमें धर्म लोगों का व्यक्तिगत‍ विश्वासमात्र हो, शिक्षा, संचार माध्यमों और राजनीतिक सहित सामाजिक जीवन के किसी भी क्षेत्र में उसका लेशमात्र दखल न हो तथा जिसमें वैज्ञानिक जीवन-दृष्टि समाज की मार्गदर्शक शक्ति हो। धार्मिक कट्टपंथ विरोधी संघर्ष के लिए हमें आज सबसे पहले जागरूक प्रबुद्ध नागरिकों को संगठित करना होगा, फिर जनता के सभी वर्गों की नुमाइन्दगी करने वाली प्रगतिशील ताकतों का संयुक्त मोर्चा बनाना होगा और फिर फासीवाद के खिलाफ फैसलाकुन लड़ाई के लिए व्यापक जनता को संगठित करना होगा।

5 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

काँग्रेस खुद एक ऐसा दल है जिस में सांप्रदायिक विद्वेष पनपता है। अवसर मिलने पर वह अपना फासीवादी रंग दिखाने से न चूकेगी।

त्यागी said...

संदीप जी कितने महेनत की है अपने हिन्दओ के खिलाफ विषावामान करने मैं जरा इस्लामिक आतंकवाद से मरने वालो की संख्या पर भी गौर करलो. या गोबर में से विटामिन ढूंढ़ कर उसीका रसपान में आनंद लेते रहो गे.

संदीप said...
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संदीप said...

श्रीमान त्‍यागी जी,

मैंने हिंदुओं नहीं, हिन्‍दुत्‍ववादी धार्मिक कट्टरपंथियों की बात कही है, उसे घुमा कर सभी हिंदुओ पर ले जाने का प्रयास क्‍यों कर रहे हैं। और यदि आपने यह पोस्‍ट ठीक से पढ़ी होती तो मैंने मुस्लिम कट्टरपंथियों का जिक्र भी किया है। वैसे यह कत्तई जरूरी है नहीं कि हिन्‍दुत्‍ववादी धार्मिक कट्टरपंथ की बात करें तो आपका दिल रखने के लिए मुस्लिम कट्टरपंथ की भी बात करें, दोनों की जमीन अलग अलग है। और उसकी जरूरत होगी तो वह भी किया जाएगा।
बाकी, जिस रसपान की बात आप कर रहे हों, उसका आनंद आप ही उठाते रहिए, अपनी पसंद दूसरों पर क्‍यों थोपते हैं।

lakhwinder said...

bahut achha hai...