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Sunday

पुजारियों की पैदावार

साथी अमर के लगातार सहयोग के चलते इस बार हम फ्रंटलाइन के जुलाई 4-17, 2009 के अंक में छपे एक लेख का अनुवाद 'बर्बरता के विरुद्ध' पर दे रहे हैं। इस लेख में मीरा नंदा ने चर्चा की है कि किस तरह विश्‍वविद्यालय का दर्जा प्राप्‍त अनेक शिक्षा संस्‍थान पंडो, पुजारियों, कर्मकाण्डियों की पूरी जमात तैयार कर रहे हैं। - मॉडरेटर 



पुजारियों की पैदावा

मीरा नन्दा




मानद विश्वविद्यालय का दर्ज़ा प्राप्त कई शैक्षिक संस्थान हिन्दू कर्मकाण्डों के खुदरा व्यापारियों के लिये आपूर्ति की महत्वपूर्ण कड़ियों की भूमिका निभा रहे हैं। भारत में जो बाज़ार के लिये फ़ायदेमंद है वही देवताओं के लिये भी फ़ायदेमंद सिद्ध हो रहा है। भारतीय मध्यवर्ग अपनी भौतिक सम्पदा में वृद्धि के अनुपात में ही पूजा और होम में भी उत्तरोत्तर वृद्धि करना आवश्यक और अनिवार्य समझता है। हर वाहन की ख़रीद के साथ पूजा होती है; ठीक वैसे ही जैसे ज़मीन के छोटे से टुकड़े पर भी किसी निर्माण से पहले भूमि-पूजन अनिवार्य होता है। और हर पूजा के साथ एक ज्योतिषाचार्य और एक वास्तुशास्त्री भी जुड़ा ही रहता है। और हर प्रतिष्ठित ज्योतिषाचार्य और वास्तुशास्त्री को कम्प्यूटर चलाना  और अंग्रेज़ी बोलना तो आना ही चाहिये ताकि वह अपनी बातों को वैज्ञानिक ढंग से प्रस्तुत कर सके।




भारत के लगातार फलते-फूलते देवताओं’  के बाज़ार को देख कर एक प्रश्न सहज ही दिमाग़ में आता है- ये मॉडर्न दिखने वाले पुजारी, ज्योतिषाचार्य, वास्तुशास्त्री, और अन्य कर्मकाण्डी दुकानदार आख़िर आ कहां से रहे हैं? सभी तरह के धार्मिक कर्मकाण्डों के लिये 21वीं सदी के हिन्दुओं की इस अनन्त मांग के लिये कर्मकाण्डी पुरोहितों की आपूर्त्ति  आख़िर होती कहां से है? मानद विश्वविद्यालय हमेशा से ही पारम्परिक गुरुकुलों और वैदिक पाठशालाओं से लेकर घरों, मन्दिरों, दफ़्तरों, दुकानों, और बड़े-बड़े कॉरपोरेट बोर्डरूमों और अनिवासी भारतीयों तक फैली इस भारतीय मध्यवर्गीय श्रँखला की एक महत्वपूर्ण कड़ी की भूमिका निभाते रहे हैं। ये विश्वविद्यालय, जिनमें से अधिकांश करदाताओं के पैसे से चलते हैं, अपने डिप्लोमा और डिग्रियों के द्वारा सक्रिय रूप से हिन्दू पुरोहित-कर्म का एक आधुनिक सँस्करण तैयार कर रहे हैं और उसे मध्यवर्ग के लिये एक आर्थिक रूप से सुविधाजनक रोज़गार के रूप में भी प्रस्तुत कर रहे हैं। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने माध्यमिक स्तर से आगे की शिक्षा में ज्योतिष और कर्मकाण्ड को सम्मिलित करने के 2001 के अपने एक कुख्यात निर्णय से पहले से ही मौजूद उन सँस्कृत संस्थाओं को एक नया जीवन-दान दे दिया जिन्हें विश्वविद्यालय का दर्ज़ा प्राप्त था। साथ ही भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय लोकतान्त्रिक मोर्चे की सरकार ने मानद विश्वविद्यालयों का एक ऐसा नेटवर्क तैयार कर दिया जो हिन्दू पुरोहितों के प्रशिक्षण के लिये लगातार प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से सहायक बना हुआ है। अब भाजपा चाहे अगले कई वर्षों तक भी राजनीतिक सत्ता से दूर रहे फिर भी सत्ता में रहते समय इसने जो संस्थागत ढांचा तैयार कर दिया था वह परम्परागत हिन्दू ज्ञान-विज्ञान को बढ़ावा देने के इसके उद्देश्य की पूर्ति करता रहेगा।
 2001 में जब विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने उच्च शिक्षा में ज्योतिष शास्त्र को शामिल करने का निर्णय लिया तब तक अपने ज्योतिष और कर्मकाण्ड सम्बन्धी पाठ्यक्रम के लिये जाने माने तीन अखिल भारतीय संस्थानों को मानद विश्वविद्यालय की मान्यता मिल चुकी थी। वे संस्थान हैं- श्री लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ, नई दिल्ली, राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ,तिरुपति, और गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार।
इन संस्थानों की विशेषज्ञता शास्त्रीय ज्ञान के बारे में है जिसमें ज्योतिष, पौरोहित्य और योग के उच्चतर पाठ्यक्रम भी शामिल हैं- वेद-वेदांग के नियमित पाठ्यक्रम के एक भाग और विशिष्ट डिप्लोमा या सर्टीफ़िकेट पाठ्यक्रमों के रूप में भी। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (और तदोपरान्त उच्चतम न्यायालय) द्वारा ज्योतिष पाठ्यक्रम को हरी झण्डी दिखाये जाने के बाद से इनका अच्छा-ख़ासा विस्तार देखने में आया। उदाहरण के लिये श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ ने 10वीं पंचवर्षीय योजना(2002-07) के दौरान ही अपने ज्योतिष विभाग के लिये नये उपकरण ख़रीदे और एक जन्म-कुण्डली बैंक स्थापित किया। ज्योतिष और पौरोहित्य में अंश-कालिक डिप्लोमा और सर्टीफ़िकेट कार्यक्रमों को प्रारंभ  करके भी इसने अपने प्रभाव-क्षेत्र का विस्तार किया। पर यह तो पानी पर तैरते हिमशैल का शिखर मात्र था।
मई 2002  में नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संस्कृति संस्थान(आर एस एस) को विश्वविद्यालय की  मान्यता मिल गई। यह पुरानी और प्रतिष्ठित संस्था(स्थापना-1970) जो लम्बे समय से प्राचीन  संस्कृत पाण्डुलिपियों और संस्कृत विद्वानों के संरक्षण के कार्य में लगी हुई थी अब नये पाठ्यक्रम बनाने, नये कोर्स प्रारम्भ करने और नई डिग्रियां प्रदान करने के लिये अधिकृत कर दी गई। इसके दसों कैम्पसों(इलाहाबाद,पुरी,जम्मू,त्रिचूर,जयपुर,लखनऊ,श्रिंगेरी,गरली,भोपाल,मुम्बई) को भी विश्वविद्यालयों के समकक्ष होने की मान्यता मिली हुई है अर्थात उनमें से प्रत्येक (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के पहले से ही परम उदार दिशा-निर्देशों के दायरे के अन्तर्गत) नये पाठ्यक्रम तैयार करने और डिग्रियां और डिप्लोमा प्रदान करने के लिये अधिकृत है। संस्थान इन कैम्पसों और नई दिल्ली और तिरुपति के उपरोक्त विद्यापीठों की गतिविधियों को समेकित करने के लिये केन्द्रक की भूमिका निभाता है। ग़ैर सरकारी गुरुकुलों और वैदिक पाठशालाओं को अनुदान और वित्तीय सहायता देना इसके कार्यभारों में से एक है। संस्कृत डिग्री धारकों के लिये रोज़गार के अवसर बेहतर करने के लिये संस्थान ज्योतिष और कर्मकाण्ड से जुड़े पाठ्यक्रमों के लिये छात्र वृत्तियां भी देता है। इसी सन्दर्भ में उन दो संस्थाओं को अभी हाल में ही योग विश्वविद्यालय की मान्यता दिये जाने का उल्लेख भी आवश्यक है जो सीधे-सीधे ज्योतिष और कर्म-काण्ड से तो नहीं जुड़े हैं परन्तु फिर भी पुजारियों की अनवरत आपूर्ति सुनिश्चित करने में जिनकी भूमिका  महत्वपूर्ण है। वे संस्थायें हैं- बेंगलुरु स्थित स्वामी विवेकानन्द योग अनुसन्धान संस्था(SVYAS)  जिसे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने 2001 में मान्यता प्रदान की थी, और मुंगेर फ़ोर्ट, बिहार स्थित बिहार योग भारती जिसे 2000 में विश्वविद्यालय के समकक्ष होने की मान्यता मिली।
पुरोहित-प्रशिक्षण संस्थानों के इस उलझे हुये ताने-बाने में दो और धागे भी हैं। केन्द्र सरकार उज्जैन स्थित महर्षि सान्दीपनि राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान को वित्तपोषित करती है जो देश भर में कुकुरमुत्तों की तरह उगती ग़ैर सरकारी वैदिक पाठशालाओं और गुरुकुलों को मान्यता और धन उपलब्ध कराने वाली संस्था के रूप में कार्य करता है। इन गुरुकुलों का मानकीकरण और उदीयमान पुरोहितों के लिये परीक्षाएं आयोजित करना इस संस्था के कार्यभारों में से हैं। इस संस्था से मान्यता मिलना गुरुकुलों की दुकान चलाने के लिए माने रखता है।
पूर्वोक्त मानद विश्वविद्यालयों के अलावा भी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा अनुमोदित राज्य स्तरीय विश्वविद्यालयों की एक श्रेणी है जिसमें मध्यप्रदेश स्थित महर्षि महेश योगी का विश्वविद्यालय और रामटेक, महाराष्ट्र स्थित कवि कुलगुरु कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय शामिल हैं। इन्हें विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से  विश्वविद्यालय की पदवी स्थापना के पश्चात नहीं मिली अपितु इनकी तो स्थापना ही इनके प्रान्तीय विधान-मण्डलों द्वारा अपने आप में सम्पूर्ण विश्वविद्यालयों के रूप में की गई थी और बाद में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा मान्यता प्रदान कर दी गई।
महर्षि महेश योगी वैदिक विश्वविद्यालय की स्थापना कांग्रेस मुख्यमन्त्री दिग्विजय सिंह के कार्यकाल में 1995 में राज्य विधानमण्डल के सर्वसम्मत प्रस्ताव द्वारा की गई थी। ऐसा महेश योगी को मध्य प्रदेश के अपने धरतीपुत्र के रूप में सम्मानित करने के लिये किया गया था। यह संस्था सभी तरह के वैदिक ज्ञान में पी एच डी आदि उच्च शैक्षिक उपाधियों का स्त्रोत बन चुकी है। इसके अनेक स्नातकों ने आगे चल कर कई मुनाफ़ा कमाने वाले उद्योग स्थापित किये और/या वास्तुशास्त्रियों, ज्योतिषियों, रत्नशास्त्रियों इत्यादि के तौर पर अकादमियों की स्थापना की।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की मान्यता प्राप्त ये राज्य-स्तरीय विश्वविद्यालय और योग विश्वविद्यालय देश भर में जहां-तहां उगते छोटे-मोटे गुरुकुलों और वैदिक पाठशालाओं के लिये अन्तिम सीढ़ी की भूमिका निभाते हैं। इनमें से कई पौरोहित्य पाठशालायें छोटे-छोटे साधनहीन लड़कों (लड़कियां निषिद्ध हैं) को प्रवेश देकर उन्हें पारम्परिक कर्म-काण्ड का प्रशिक्षण देते हैं। पर क्योंकि वे अकादमिक डिग्रियां प्रदान करने के लिये अधिकृत नहीं हैं अतः वे अपने छात्रों को किसी भी ऐसे मानद या मान्यताप्राप्त राज्य-स्तरीय विश्वविद्यालय में भेज देते हैं जिसकी विशेषज्ञता योगिक अथवा वैदिक विज्ञानों में हो जिनके दायरे में मोटे तौर पर ज्योतिष से लेकर योग तक सभी कुछ आ जाता है। इससे पुजारियों और कर्मकाण्डियों के रूप में देश-विदेश के बाज़ारों में उनके विद्यार्थियों की मार्केटेबिलिटी बेहतर हो जाती है।
ये सही है कि संस्कृत की शिक्षा का हिन्दू धर्म के कर्मकाण्डों से गहरा सम्बन्ध है और कई बार दोनों को अलग-अलग करना कठिन होता है। यज्ञ या पूजा संस्कृत की डिग्री प्राप्त करने के लिये यजुर्वेद के अध्ययन का एक प्रायोगिक पहलू मात्र है। परन्तु संस्कृत में लिखे धार्मिक साहित्य के अध्यापन और कर्मकाण्डों के अध्यापन के बीच में कोई सीमारेखा खींचने का प्रयास करने के स्थान पर भारतीय शिक्षा व्यवस्था ठीक विपरीत दिशा में मुड़ गई है। यह संस्कृत और हिन्दू दर्शन की शिक्षा की आड़ में जनता के पैसे और संसाधनों का उपयोग हिन्दू कर्मकाण्डों को बढ़ावा देने के लिये कर रही है।
अगर भारत अपने सार्वजनिक संसाधन मानद विश्वविद्यालयों के माध्यम से बहुमत के धर्म को प्रोत्सहित करने में झोंकता है तो क्या वह ख़ुद को एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य कह सकता है?

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Friday

राष्ट्रीय सुरक्षा अकादमी : दिल्ली में बजरंग दल के शिविर में नई पीढ़ी का जन्म

हलका के जून अंक में  बजरंग दल के एक कैंप पर तुषा मित्तल की रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी। हमारे ब्‍लॉगर साथी अमर ने उस टिप्‍पणी का अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद करके भेजा है, जिसे  'बर्बरता के विरुद्ध' पर पोस्‍ट किया जा रहा है। साथी अमर 'बर्बरता के विरुद्ध' के लिए लगातार सहयोग कर रहे हैं। और उनके इस सहयोग का हम तहेदिल से स्‍वागत करते हैं। - मॉडरेटर 


दिल्ली में बजरंग दल के शिविर में नई पीढ़ी का जन्म




 तुषा मित्तल

पश्चिम दिल्ली के सरस्वती बाल मन्दिर विद्यालय में एक तीखी सीटी की आवाज़ सुबह की ख़ामोशी को चीर जाती है। सफ़ेद कमीज़ और ख़ाकी हाफ़ पैण्ट पहने छोटे-छोटे लड़के मैदान में एकत्रित हो जाते हैं। योगाभ्यास ठीक 4.30 पर शुरु हो जायेगा। उसके बाद शुरू होंगे कराते, जूडो, और मुक्केबाज़ी। पहली नज़र में कोई भी इसे लड़कों का ‘समर कैंप’ समझने की भूल कर सकता है। पर नज़दीक से देखने पर मामला कुछ और ही नज़र आता है। यहां तो लाठियों के पिरामिड, आग के गोले, बन्दूकों के धमाके, और युद्ध के विभिन्न स्तरों के
पाठ पढ़ाये जा रहे हैं। अगर उनके घरों में ‘आतँकवादी, मुसलमान, या अवैध घुसपैठिये’ आग लगा दें तो लड़कों को लपटों में से कूदना आना ही चाहिये; बन्दूक का सटीक उपयोग कर सकने के लिये उसकी भी गहरी जानकारी आवश्यक है।
उनकी बाहों और माथे पर लाल छापे वाली चमकीली भगवा पट्टियां बंधी हुई हैं। सरोजिनी नगर के एक कपड़ों के दुकानदार के 15 वर्षीय बेटे सन्दीप यादव को भगवा रंग से प्रेरणा मिलती है और अपनेपन की अनुभूति होती है। उसका कहना है-“ये मुझे लड़ाई के लिये तैयार कर देता है”। लड़ाई किसके लिये? “भारतमाता की रक्षा के लिये”। रक्षा किससे? “आक्रमण से”। किसके आक्रमण से? वह हकलाने लगता है- अंग्रेज़ों,ऑस्ट्रेलिया वालों, ईसाइयों, मुसलमानों के आक्रमण से। उसके हाल में ही अर्जित वैश्विक दृष्टिकोण को हलका सा कुरेदने से यह ज्ञान मिलता है-“ हिन्दू लड़कियों को बिना आस्तीन के कपड़े नहीं पहनने चाहिये। भारतीय संस्कृति हमें यही

सिखाती है। और अगर कोई हिन्दू लड़की किसी मुस्लिम पुरुष से शादी कर ले तो उसका सर काट देना चाहिये और उस मुस्लिम का भी।“ दक्षिणपन्थी विश्व हिन्दू परिषद की युवा शाखा बजरंग दल के प्रशिक्षण शिविर में आपका स्वागत है। एक सप्ताह चलने वाला यह शिविर हर साल “हिन्दू युवकों में साहस का संचार करने और उन्हें अपने देशभक्तिपूर्ण कर्तव्यों के प्रति जागरूक करने के लिये” लगाया जाता है। ऐसा कहना है दिल्ली बजरंग दल के संयोजक अशोक कपूर का। “हम लोगों को आवश्यकता पड़ने पर ज़मीनी लड़ाई के लिये तैयार करते हैं” शैलेन्द्र जायसवाल,प्रान्तीय सहसंयोजक सुर में सुर मिलाते हैं। “हम उन्हें छांट-छांट कर चुनते हैं। उन्हें हिन्दू होना चाहिये और हमारे स्थानीय पार्टी कार्यकर्ताओं के संपर्क में होना चाहिये,“ वे कहते हैं। 
आधिकारिक आयु है 15 से 35 वर्ष। जून में समाप्त हुए 2009 के शिविर में 100 लोग सम्मिलित हुए थे। अधिकांश किसी दक्षिणपन्थी पृष्ठभूमि से आते हैं (बजरंग दल कार्यकर्ताओं के बच्चे, उनके पड़ोसी, या फिर संभवतया वे अपनी कॉलोनी में विश्व हिन्दू परिषद द्वारा संचालित योग कक्षाओं मे जाने वाले लोग हैं)। फिर भी बजरंग दल से यह उनका पहला परिचय है। इन बच्चों से बात करके न केवल ये पता चलता है कि बजरंग दल स्वयम को किस दृष्टि से देखता है बल्कि यह भी कि दल अपने भावी प्यादों को कैसे सुविचारित-सुनियोजित तरीके से से शिक्षित-दीक्षित करता है। यह शिविर तो एक कहीं अधिक लंबी यात्रा का आधार-शिविर मात्र है। पूरे वर्ष ही विशालतर मूल संगठन आर एस एस के अन्य शिविर इन नये रंगरूटों को अपनी “बौद्धिक अवधारणाओं” को धार देने का अवसर देंगे- प्रशिक्षण का फ़ोकस शारीरिक कसरतों से आगे बढ़ कर बारीक मानसिक नक्काशी पर केन्द्रित हो जायेगा। कुछ प्राथमिक बेल-बूटे तो पहले ही उकेरे भी जा चुके हैं।
14 वर्षीय, बमुश्किल 4 फ़ीट कद वाले,एक कपड़ा-फ़ैक्ट्री कर्मचारी के बेटे विनीत कुमार से जब पूछा गया कि बजरंग दल क्या है तो अपनी बालसुलभ बारीक आवाज़ में उसने कुछ वाक्यांशों मे उत्तर दिया- “राम सेतु, राम जन्मभूमि, अमरनाथ यात्रा ,हड़ताल,और चक्का जाम”। उसके अनुसार “पाकिस्तानी आतँकवादी” अमरनाथ यात्रा को बन्द करवाना चाहते थे पर बजरंग दल जम्मू और कश्मीर के
बच्चे-बच्चे को इसका विरोध करने के लिये गलियों में निकाल लाया। शिविर में विनीत ने एक नया शब्द भी सीखा है जिसे इस्तेमाल करने का कोई भी मौका वह नहीं छोड़ता। और वह शब्द है – विरोध- यही तो वह करना चाहता है बड़ा होकर। यह पूछने पर कि वह किसका विरोध करेगा उसकी आँखें इधर उधर भटकने लगती हैं; मानो घुट्टी में पिलाये गये किताबी जवाबों के घालमेल में से कुछ खोज रही हों।

वहां भाषण भी हुए। माइक की गूंजती हुई आवाज़ बालकों को 6 मकारों(6 Ms) से सावधान रहने की सलाह दे रही थी – मुस्लिम, मिशनरी, मार्क्सवादी,(लॉर्ड) मैकाले, (विदेशी) मीडिया, और माइनो (यू पी ए अध्यक्षा सोनिया गाँधी का मध्य नाम) फिर महाविनाश की चेतावनी: कलियुग आ चुका है। हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन करके और हिन्दू होने का दिखावा करके हमारी औरतों से विवाह करके मुसलमान देश पर कब्ज़ा जमाये ले रहे हैं। जल्दी ही हिन्दुओं का तो नाम-निशान भी नहीं रहेगा। भारत में उनकी संख्या हिन्दुओं से अधिक तो पहले ही हो चुकी है। हमें मुल्लों को अपने देश से निकाल देना चाहिये। वे हमारी गऊ माता की हत्या करते हैं; हर गाय में 2300 देवियां रहती हैं। 


“हम मुसलमानों का भरोसा नहीं कर सकते, वे हमारी गायों तक को नहीं छोड़ते, हमें क्या छोड़ेंगे?” ये कहना है दिल्ली के एक सब्ज़ी बेचने वाले के 14 वर्षीय बेटे अनिल का। संदीप (15 वर्ष) का कहना है कि “अगर कोई हिन्दू लड़की किसी मुस्लिम लड़के से शादी करे तो उस लड़की का सर काट देना चाहिये।“ और क्रान्तिकारी गीत – हिन्दू के हित पर जनमूं, हिन्दू के हित मर जाऊं, हो जाओ तैयार साथियों, अर्पित कर दो हज़ार बलिदान। नारे भी लगे- शस्त्रमेव जयते। अमरनाथ की भूमि बचाने की कोशिश करते बजरंग दल कार्यकर्ताओं की पुलिस द्वारा पिटाई के सबूत के तौर पर सी डी भी उपलब्ध हैं। और जब तरुण ब्रिगेड पर्याप्त जोश में आ चुकी तो नारे लगने लगे- राम राम चिल्लायेंगे, मुल्ले काटे जायेंगे। और वकील भी उपस्थित हैं यह बताने के लिये कि आपराधिक आरोपों से कैसे बचा जाये। कोई आश्चर्य नहीं कि जब गुरु ने पूछा कि “हम मुसलमानों का सफ़ाया कैसे करेंगे?” तो लड़कों ने एक स्वर में कहा:”हम उन्हें काट डालेंगे!”
और अन्त में एक सलाह थी, जीवन भर के लिये:अगर तुम्हारे घर पर हमला हो और तुम्हारे पास कोई हथियार न हो तो तुम्हें क्या करना चाहिये? मोटरसाइकिल की चेन से काम लो। गैस का सिलेण्डर निकाल लाओ। घर के चारो ओर तेल छिड़क कर आग लगा दो ताकि आतँकवादी अन्दर न आ सकें। अगर मुसलमान तुम्हारे इलाके में रहने आते हैं तो तुम्हें क्या करना चाहिये? उनकी पृष्ठभूमि का पता करो। उनसे दोस्ती कर लो पर उन्हें अपने घर मत बुलाओ। उनकी औरतों से पता करो कि क्या उनकी शादी ज़बरदस्ती करवाई गई है। अगर ऐसा हुआ हो तो पुलिस को ख़बर कर दो। विनीत कहता है “मेरी गली के मुसलमान तो अच्छे हैं। वे अपनी औरतों को बुरका पहनने के लिये बाध्य नहीं करते और अपने बच्चों को भी खेलने देते हैं। पर बाकी मुसलमानों की औरतें और बच्चे अगर घर से बाहर कदम भी रखें तो वे उन्हें काट डालते हैं।“ दक्षिण दिल्ली के बदरपुर इलाके के अपने मामूली से घर में विनीत की मां स्तब्ध होकर यह सब सुनती हैं। “मुझे नहीं पता था कि वे लोग ये सब सिखाते हैं”, कुमारी देवी कहती हैं। वे असमंजस में हैं कि अगले साल अपने बेटे को वहां भेजें या न भेजें। पर अब इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। उनके बेटे को उसका जीवन-ध्येय पहले ही मिल चुका है- हिन्दू समाज सेवा- बजरंग दल के निर्देशानुसार।


(तहलका से साभार) 

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तरुण विजय क्यों मान गये कि आरएसएस एक हिन्दू दक्षिणपन्थी संगठन है?

अप्रैल में टाइम्‍स ऑफ इंडिया में तरुण विजय के एक लेख पर किसी ने किसी अंग्रेजी पत्रिका की साइट पर एक टिप्‍पणी की थी। उस अंग्रेजी की साइट का नाम तो नोट करना भूल गया था लेकिन उसका मैटर कॉपी कर लिया था। हमारे एक ब्‍लॉगर साथी अमर ने उस टिप्‍पणी का अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद करके भेजा है, जिसे  'बर्बरता के विरुद्ध' पर पोस्‍ट कर रहा हूं।


तरुण विजय क्यों मान गये कि आरएसएस 
एक हिन्दू दक्षिणपन्थी संगठन है?

आर एस एस मुखपत्र ‘पाँचजन्य’ के भूतपूर्व संपादक तरुण विजय (उन्होंने दो दशक से भी अधिक समय तक इसका संपादन किया था) का एक लेख 29 अप्रैल 2009 के ‘टाइम्स ऑफ़ इण्डिया’ के संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ था। उसमें उन्होंने भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में विचारधारा पर चर्चा की थी। यह लेख ‘टाइम्स ऑफ़ इण्डिया’ के स्तर के उपयुक्त नहीं था। एक सामान्य पाठक के लिये तो इसमें यह भी स्पष्ट नहीं हो पाता कि आख़िर वो कहना क्या चाहते हैं। इतिहास की गलियों में भटकते-भटकते वे वर्तमान की चर्चा करने लगते हैं पर किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाते। उनका परिचय डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी शोध संस्थान(एक संस्थान जिसका अपेक्षित और स्वघोषित लक्ष्य है संघ परिवार के वैचारिक संघर्ष को दिशा और नेतृत्व प्रदान करना) के निदेशक के रूप में दिया गया है। अतः जो कुछ भी वे लिखते या कहते हैं उसे संघ परिवार का आधिकारिक दृष्टिकोण माना जा सकता है। उपरोक्त लेख में उन्होंने कहा कि

भारतीय राजनीति में सिर्फ़ दो ही विचारधारायें हैं: एक, हिन्दू दक्षिणपन्थ(अर्थात भाजपा सहित पूरा संघ परिवार) और वाम। इस कथन ने इतिहासकारों, समाज विज्ञानियों, और वाम रुझान वाले राजनीतिक टिप्पणीकारों को भी अचम्भित कर दिया। वे तो कल्पना भी नहीं कर सकते थे कि आर एस एस यह कबूल कर लेगा कि वह एक हिन्दू दक्षिणपन्थी संगठन है। एक मामूली स्नातक, अख़बार का एक आम पाठक भी यह जानता है कि ‘हिन्दू दक्षिणपन्थ’ का अर्थ है फ़ासीवाद का हिन्दू संस्करण। यह पारिभाषिक शब्द संघ परिवार के प्रति घृणा व्यक्त करने के लिये ही प्रयुक्त होता है। सुमित सरकार, तूलिका सरकार, डी एन झा, रोमिला थापर, रामचन्द्र गुहा या क्रिस्टोफ़र जेफ़लो आदि इस शब्द का प्रयोग आर एस एस और इसके विचारधारात्मक परिवार की कथित अल्पसंख्यक विरोधी राजनीति और विचारधारा, निरंकुशतावाद और धर्मनिरपेक्षता-विरोधी परम्परा की ओर संकेत करने के लिये करते हैं। तरुण विजय सगर्व यह दावा करते हैं कि कि संघ एक हिन्दू दक्षिणपन्थी आन्दोलन है। इस और ध्यान दिलाने पर तो आर एस एस के इतिहासकार भी चकित रह गये। पर अब बहुत देर हो चुकी है। उनमें से एक ने कहा कि तरुण इसके निहितार्थ से बिलकुल अनभिज्ञ हैं। वे कोई राजनीति विज्ञानवेत्ता नहीं हैं अतः उन्होंने भूलवश आर एस एस के लिये हिन्दू दक्षिणपन्थी शब्द लिख दिया। एक अन्य ने कहा कि उनका “प्रेतलेखक” संभवतया कोई भूतपूर्व वामपन्थी है जो इस शब्द का निहितार्थ नहीं समझ सका। एक इतिहासविद और स्तम्भकार ने कहा “उन लोगों से पूछिये जिन्होंने उन्हें निदेशक बनाया है”; उनका तात्पर्य भाजपा नेतृत्व से था। ये आर एस एस का बौद्धिक दिवालियापन है या फिर लोकतन्त्र से उसका मोहभंग? अब से सारी दुनिया के टीकाकार और समाजविज्ञानी तरुण विजय का हवाला देते हुए आर एस एस को एक फ़ासिस्ट संगठन मानेंगे। टाइम्स ऑफ़ इण्डिया का प्रसार और विश्वसनीयता दोनों ही बहुत व्यापक हैं। इसके आलेख दूर-दूर तक पढ़े और उद्धृत किये जाते हैं। इसी वजह से एक हिन्दू दक्षिणपन्थी संगठन के रूप में आर एस एस का नया अवतार उसके लिए राजनीतिक रूप से ख़तरनाक होगा।

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