राष्ट्रीय सुरक्षा अकादमी : दिल्ली में बजरंग दल के शिविर में नई पीढ़ी का जन्म

हलका के जून अंक में  बजरंग दल के एक कैंप पर तुषा मित्तल की रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी। हमारे ब्‍लॉगर साथी अमर ने उस टिप्‍पणी का अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद करके भेजा है, जिसे  'बर्बरता के विरुद्ध' पर पोस्‍ट किया जा रहा है। साथी अमर 'बर्बरता के विरुद्ध' के लिए लगातार सहयोग कर रहे हैं। और उनके इस सहयोग का हम तहेदिल से स्‍वागत करते हैं। - मॉडरेटर 


दिल्ली में बजरंग दल के शिविर में नई पीढ़ी का जन्म




 तुषा मित्तल

पश्चिम दिल्ली के सरस्वती बाल मन्दिर विद्यालय में एक तीखी सीटी की आवाज़ सुबह की ख़ामोशी को चीर जाती है। सफ़ेद कमीज़ और ख़ाकी हाफ़ पैण्ट पहने छोटे-छोटे लड़के मैदान में एकत्रित हो जाते हैं। योगाभ्यास ठीक 4.30 पर शुरु हो जायेगा। उसके बाद शुरू होंगे कराते, जूडो, और मुक्केबाज़ी। पहली नज़र में कोई भी इसे लड़कों का ‘समर कैंप’ समझने की भूल कर सकता है। पर नज़दीक से देखने पर मामला कुछ और ही नज़र आता है। यहां तो लाठियों के पिरामिड, आग के गोले, बन्दूकों के धमाके, और युद्ध के विभिन्न स्तरों के
पाठ पढ़ाये जा रहे हैं। अगर उनके घरों में ‘आतँकवादी, मुसलमान, या अवैध घुसपैठिये’ आग लगा दें तो लड़कों को लपटों में से कूदना आना ही चाहिये; बन्दूक का सटीक उपयोग कर सकने के लिये उसकी भी गहरी जानकारी आवश्यक है।
उनकी बाहों और माथे पर लाल छापे वाली चमकीली भगवा पट्टियां बंधी हुई हैं। सरोजिनी नगर के एक कपड़ों के दुकानदार के 15 वर्षीय बेटे सन्दीप यादव को भगवा रंग से प्रेरणा मिलती है और अपनेपन की अनुभूति होती है। उसका कहना है-“ये मुझे लड़ाई के लिये तैयार कर देता है”। लड़ाई किसके लिये? “भारतमाता की रक्षा के लिये”। रक्षा किससे? “आक्रमण से”। किसके आक्रमण से? वह हकलाने लगता है- अंग्रेज़ों,ऑस्ट्रेलिया वालों, ईसाइयों, मुसलमानों के आक्रमण से। उसके हाल में ही अर्जित वैश्विक दृष्टिकोण को हलका सा कुरेदने से यह ज्ञान मिलता है-“ हिन्दू लड़कियों को बिना आस्तीन के कपड़े नहीं पहनने चाहिये। भारतीय संस्कृति हमें यही

सिखाती है। और अगर कोई हिन्दू लड़की किसी मुस्लिम पुरुष से शादी कर ले तो उसका सर काट देना चाहिये और उस मुस्लिम का भी।“ दक्षिणपन्थी विश्व हिन्दू परिषद की युवा शाखा बजरंग दल के प्रशिक्षण शिविर में आपका स्वागत है। एक सप्ताह चलने वाला यह शिविर हर साल “हिन्दू युवकों में साहस का संचार करने और उन्हें अपने देशभक्तिपूर्ण कर्तव्यों के प्रति जागरूक करने के लिये” लगाया जाता है। ऐसा कहना है दिल्ली बजरंग दल के संयोजक अशोक कपूर का। “हम लोगों को आवश्यकता पड़ने पर ज़मीनी लड़ाई के लिये तैयार करते हैं” शैलेन्द्र जायसवाल,प्रान्तीय सहसंयोजक सुर में सुर मिलाते हैं। “हम उन्हें छांट-छांट कर चुनते हैं। उन्हें हिन्दू होना चाहिये और हमारे स्थानीय पार्टी कार्यकर्ताओं के संपर्क में होना चाहिये,“ वे कहते हैं। 
आधिकारिक आयु है 15 से 35 वर्ष। जून में समाप्त हुए 2009 के शिविर में 100 लोग सम्मिलित हुए थे। अधिकांश किसी दक्षिणपन्थी पृष्ठभूमि से आते हैं (बजरंग दल कार्यकर्ताओं के बच्चे, उनके पड़ोसी, या फिर संभवतया वे अपनी कॉलोनी में विश्व हिन्दू परिषद द्वारा संचालित योग कक्षाओं मे जाने वाले लोग हैं)। फिर भी बजरंग दल से यह उनका पहला परिचय है। इन बच्चों से बात करके न केवल ये पता चलता है कि बजरंग दल स्वयम को किस दृष्टि से देखता है बल्कि यह भी कि दल अपने भावी प्यादों को कैसे सुविचारित-सुनियोजित तरीके से से शिक्षित-दीक्षित करता है। यह शिविर तो एक कहीं अधिक लंबी यात्रा का आधार-शिविर मात्र है। पूरे वर्ष ही विशालतर मूल संगठन आर एस एस के अन्य शिविर इन नये रंगरूटों को अपनी “बौद्धिक अवधारणाओं” को धार देने का अवसर देंगे- प्रशिक्षण का फ़ोकस शारीरिक कसरतों से आगे बढ़ कर बारीक मानसिक नक्काशी पर केन्द्रित हो जायेगा। कुछ प्राथमिक बेल-बूटे तो पहले ही उकेरे भी जा चुके हैं।
14 वर्षीय, बमुश्किल 4 फ़ीट कद वाले,एक कपड़ा-फ़ैक्ट्री कर्मचारी के बेटे विनीत कुमार से जब पूछा गया कि बजरंग दल क्या है तो अपनी बालसुलभ बारीक आवाज़ में उसने कुछ वाक्यांशों मे उत्तर दिया- “राम सेतु, राम जन्मभूमि, अमरनाथ यात्रा ,हड़ताल,और चक्का जाम”। उसके अनुसार “पाकिस्तानी आतँकवादी” अमरनाथ यात्रा को बन्द करवाना चाहते थे पर बजरंग दल जम्मू और कश्मीर के
बच्चे-बच्चे को इसका विरोध करने के लिये गलियों में निकाल लाया। शिविर में विनीत ने एक नया शब्द भी सीखा है जिसे इस्तेमाल करने का कोई भी मौका वह नहीं छोड़ता। और वह शब्द है – विरोध- यही तो वह करना चाहता है बड़ा होकर। यह पूछने पर कि वह किसका विरोध करेगा उसकी आँखें इधर उधर भटकने लगती हैं; मानो घुट्टी में पिलाये गये किताबी जवाबों के घालमेल में से कुछ खोज रही हों।

वहां भाषण भी हुए। माइक की गूंजती हुई आवाज़ बालकों को 6 मकारों(6 Ms) से सावधान रहने की सलाह दे रही थी – मुस्लिम, मिशनरी, मार्क्सवादी,(लॉर्ड) मैकाले, (विदेशी) मीडिया, और माइनो (यू पी ए अध्यक्षा सोनिया गाँधी का मध्य नाम) फिर महाविनाश की चेतावनी: कलियुग आ चुका है। हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन करके और हिन्दू होने का दिखावा करके हमारी औरतों से विवाह करके मुसलमान देश पर कब्ज़ा जमाये ले रहे हैं। जल्दी ही हिन्दुओं का तो नाम-निशान भी नहीं रहेगा। भारत में उनकी संख्या हिन्दुओं से अधिक तो पहले ही हो चुकी है। हमें मुल्लों को अपने देश से निकाल देना चाहिये। वे हमारी गऊ माता की हत्या करते हैं; हर गाय में 2300 देवियां रहती हैं। 


“हम मुसलमानों का भरोसा नहीं कर सकते, वे हमारी गायों तक को नहीं छोड़ते, हमें क्या छोड़ेंगे?” ये कहना है दिल्ली के एक सब्ज़ी बेचने वाले के 14 वर्षीय बेटे अनिल का। संदीप (15 वर्ष) का कहना है कि “अगर कोई हिन्दू लड़की किसी मुस्लिम लड़के से शादी करे तो उस लड़की का सर काट देना चाहिये।“ और क्रान्तिकारी गीत – हिन्दू के हित पर जनमूं, हिन्दू के हित मर जाऊं, हो जाओ तैयार साथियों, अर्पित कर दो हज़ार बलिदान। नारे भी लगे- शस्त्रमेव जयते। अमरनाथ की भूमि बचाने की कोशिश करते बजरंग दल कार्यकर्ताओं की पुलिस द्वारा पिटाई के सबूत के तौर पर सी डी भी उपलब्ध हैं। और जब तरुण ब्रिगेड पर्याप्त जोश में आ चुकी तो नारे लगने लगे- राम राम चिल्लायेंगे, मुल्ले काटे जायेंगे। और वकील भी उपस्थित हैं यह बताने के लिये कि आपराधिक आरोपों से कैसे बचा जाये। कोई आश्चर्य नहीं कि जब गुरु ने पूछा कि “हम मुसलमानों का सफ़ाया कैसे करेंगे?” तो लड़कों ने एक स्वर में कहा:”हम उन्हें काट डालेंगे!”
और अन्त में एक सलाह थी, जीवन भर के लिये:अगर तुम्हारे घर पर हमला हो और तुम्हारे पास कोई हथियार न हो तो तुम्हें क्या करना चाहिये? मोटरसाइकिल की चेन से काम लो। गैस का सिलेण्डर निकाल लाओ। घर के चारो ओर तेल छिड़क कर आग लगा दो ताकि आतँकवादी अन्दर न आ सकें। अगर मुसलमान तुम्हारे इलाके में रहने आते हैं तो तुम्हें क्या करना चाहिये? उनकी पृष्ठभूमि का पता करो। उनसे दोस्ती कर लो पर उन्हें अपने घर मत बुलाओ। उनकी औरतों से पता करो कि क्या उनकी शादी ज़बरदस्ती करवाई गई है। अगर ऐसा हुआ हो तो पुलिस को ख़बर कर दो। विनीत कहता है “मेरी गली के मुसलमान तो अच्छे हैं। वे अपनी औरतों को बुरका पहनने के लिये बाध्य नहीं करते और अपने बच्चों को भी खेलने देते हैं। पर बाकी मुसलमानों की औरतें और बच्चे अगर घर से बाहर कदम भी रखें तो वे उन्हें काट डालते हैं।“ दक्षिण दिल्ली के बदरपुर इलाके के अपने मामूली से घर में विनीत की मां स्तब्ध होकर यह सब सुनती हैं। “मुझे नहीं पता था कि वे लोग ये सब सिखाते हैं”, कुमारी देवी कहती हैं। वे असमंजस में हैं कि अगले साल अपने बेटे को वहां भेजें या न भेजें। पर अब इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। उनके बेटे को उसका जीवन-ध्येय पहले ही मिल चुका है- हिन्दू समाज सेवा- बजरंग दल के निर्देशानुसार।


(तहलका से साभार) 

11 comments:

अवधिया चाचा said...

अजब तमाशा है, जानकारी अच्‍छी है दिल से कह रहा हूं, हमारा अवध जाना हुआ तो अवध वालों को दिखाएंगे,

अवधिया चाचा
जो कभी अवध ना गया

Mohammed Umar Kairanvi said...

हैरत हुई यह बातें पढकर, हिंन्‍दी ब्लागस में यह बातें कोई देसकता है, ऐसा तो मेरा अनुमान भी नहीं था, बधाई

बर्बता के विरूद्ध किसी शायर ने किया खूब कहा हैः

जंग ख़ुद एक मसअला है, जंग क्या मसअलों का हल देगी।
आग और ख़ून आज बख़्शेगी, भूख और एहतियाज कल देगी।।
इसलिए ऐ शरीफ इंसानों, जंग टलती रहे तो बेहतर है।
हम और आप सभी के आँगन में, शमाँ जलती रहे तो बेहतर है।।

Dr. Amar Jyoti said...

@भाई मुहम्मद उमर साहब,
किसी शायर ने ये भी तो कहा है:-
गो जंग बुरी चीज़ है,पर ज़ुल्म के ख़िलाफ़
गर जंग लाज़मी है, तो फिर जंग ही सही

अमृत पाल सिंह said...

शर्मनाक कार्य हो रहे हैं आज।
बहुत दुख होता है जब मालूम होता है कि देश में ये सब भी हो रहा है वो भी खुलेआम।
अच्छी जानकारी है।
लेकिन दुखदायी।

ali said...

बचपन विषाक्त करते हुये लोग !

गिरिजेश राव said...

संतुलन की माँग है कि सालों साल चलते मदरसों के जलसे और मस्जिदों की तकरीरों से भी हो आइए।

प्रतिरोध जीवित रहना चाहिए। जब दंगे होते हैं तो यही प्रतिरोध काम आता है। 1947-48 तो याद है न आप को? उसके पहले और बाद के दंगे भी याद रखिए...
ऐसी रिपोर्टों पर मुझे दंगे के समय छत पर चढ़ 'झूठा सच' का हर हर महादेव चिल्लाता पुरी याद आ जाता है। ... हाँ मैं संघी नहीं हूँ लेकिन बौद्धिकता और उदारता के नाम पर नपुंसक हो जाने का विरोधी हूँ।

समय said...

गिरिजेश क्या खूब कह गये हैं।

प्रतिरोध जीवित रहना चाहिए।
संघ यही करेगा, मदरसे यही करेंगे: प्रतिरोध की तैयारी। फिर दंगे-दंगे खेलते रहेंगे।

नपुंसकता के निबटारे के लिए दंगों का होना कितना जरूरी है, शायद आज के समय का यही सच है?

यही है परम प्राथमिकता?
और शायद, माकूल है हमारी सुविधापरस्त मानसिकता के लिए ऐसी ही तार्किक परिणति?

मुआफ़ी। शुक्रिया भी।

sahespuriya said...

चड़ी हुई है जो नदी उतर भी सकती है
जो बाँट रही है मौत वो मर भी सकती है
अब इससे ज़्यादा क्या कहना, आजतक कहते रहे ग़रीब मुसलमानो के बच्चे मदरसों मैं पढ़ कर 'आतंकवादी' बन रहे हैं. मगर ग़रीब हिंदू का बच्चा ही क्यों इनशिविरो मैं आता हैं, कहीं उसे भी आतंवादी बनाए की तय्यरी तो नही ? मगर इतना ध्यान रहे दूसरे के घर मैं आग लगाने से पहले, कहीं अपना घर ही ना जल जाए.

Tarun Bhardwaj said...

chakit hu..kaise pratirodh ke naam par kuchh mutthi bhar partiyon or sansthao ke virudh vishvaman kiya ja raha hai..aapke paise kaha se aate hai??? China, roos cuba or venezuela se toh nahi aa rahe????

moderator jawab de ki kya ye kathan "“पाकिस्तानी आतँकवादी” अमरनाथ यात्रा को बन्द करवाना चाहते hain" sahi nahi hai???
pakistani aatankwadi shabd ko qoute-unquote karke kya batana chah rahe hai????

kya kasab bhi pakistani aatanki nahi hai???

Kya Nariman house, taj or oberoi me band log agar aatmaraksha jante toh shayad nateeja kuchh ulat hota???

अशोक कुमार पाण्डेय said...

हां प्रतिरोध ज़िन्दा रहे…भूख के ख़िलाफ़, शोषण के ख़िलाफ़…अन्याय के ख़िलाफ़!

शरद कोकास said...

वह शब्द है – विरोध- यही तो वह करना चाहता है बड़ा होकर। यह पूछने पर कि वह किसका विरोध करेगा.....
मीलॉर्ड ध्यान दिया जाये ..यहाँ प्रतिरोध नही विरोध है ।