धर्म, सांप्रदायिकता और धर्म-निरपेक्षता : गोरख पाण्‍डेय

धर्म-निरपेक्षता क्‍या है? या हमारे यहां सेक्‍युलरिज्‍म सांप्रदायिकता से लड़ते हुए इतना खोखला, नकली और निरीह क्‍यों नजर आता है? इसकी वजह हमें यह समझ आती है कि धर्म-निरपेक्षता को उसके असली अर्थों में हमने ग्रहण ही नहीं किया। प्रगतिशील कहे जाने वाले तबके ने भी उसकी उसी परिभाषा (सर्वधर्मसमभाव वाली) को आंख मूंद कर स्‍वीकार कर लिया जो शासक वर्ग की जरूरतों के हिसाब से गढ़ी गयी थी। हम चाहते हैं कि धर्म-निरपेक्षता के असली अर्थ और उसके मूल्‍यों पर नये सिरे से समझ बनाये जाने की जरूरत है। इस समझ के लिए जरूरी बहस-मुबाहिसे के लिए हम यहां गोरख पाण्‍डेय का इस विषय पर एक महत्‍वपूर्ण लेख धर्म, सांप्रदायिकता और धर्म-निरपेक्षता, (साभार परिवेश पत्रिका) के अंतिम हिस्‍से का पहला भाग दे रहे हैं। हम उम्‍मीद करते हैं कि धर्म-निरपेक्षता को उसके असली अर्थ में समझने की एक ईमानदार शुरुआत की जाएगी...



धर्म, सांप्रदायिकता और धर्म-निरपेक्षता


— गोरख पाण्‍डेय



धर्म-निरपेक्षता क्‍या है? क्‍या यह सर्वधर्मसमभाव है? क्‍या आप धार्मिक भी बने रह सकते हैं और धर्म-निरपेक्ष भी? कोई भी धार्मिक व्‍यक्ति या व्‍यक्तियों का समूह सर्वधर्मसमभाव के अर्थ में धर्म-निरपेक्ष नहीं हो सकता। क्‍योंकि उसका अपना एक धर्म है और उसके लिए दूसरे धर्म पराये हैं। असल में धार्मिकता और धर्म-निरपेक्षता एक साथ नहीं चल सकतीं।


यूरोप के आधुनिक इतिहास पर गौर करें तो पायेंगे कि वहां इसकी धारणा सीधे धर्म के विरोध में विकसित हुई। दूसरे लोक की कल्‍पना को नकारना और इस लोक या यथार्थ को इसी के नियमों के आधार पर व्‍याख्‍यायित करना चिन्‍तन का इहलौकिकीकरण (सेक्‍युलराइजेशन) माना गया।


इस अर्थ में धर्म-निरपेक्षता चिन्‍तन की वह प्रवृत्ति है जो विज्ञान और बुद्धिवाद के आधार पर विकसित होती है, अनुभव, तर्क और प्रयोग पर बल देती है और धार्मिक चिन्‍तन की अबौद्धिक पारलौकिकता का निषेध करती है। इसके साथ यूरोप के इतिहास का यह तथ्‍य भी जुड़ा हुआ है कि मध्‍य-युग में राज्‍य के ऊपर धर्म (चर्च) की स्‍थापित सत्ता को चुनौती देना और राज्‍य के समस्‍त इहलौकिक क्रिया-कलाप से धर्म को अलग कर देना भी क्रमश: धर्म-निरपेक्षता का एक रूप बन गया। धर्म-निरपेक्षता राज्‍य के एक गुण के रूप में विकसित हुई जिसके अनुसार वह धर्म को व्‍यक्तिगत सरोकार मानेगा, सामाजिक संबंधों से धर्म को अलग करेगा और धर्म के आधार पर किसी को विशेषाधिकार न प्रदान करेगा। इसका आशय यह भी है कि धर्म-निरपेक्ष राज्‍य अपनी विचारधारा निर्मित और प्रचारित करेगा, बुद्धि और तर्क को प्रोत्‍साहन देगा और धार्मिक चेतना के आग्रहों को अप्रासंगिक बनाता जायेगा।


अपने देश में धर्म-निरपेक्षता की जो परिभाषा फैलायी गयी, वह धार्मिकता के ज्‍यादा करीब थी। इसे सर्वधर्मसमभाव या धर्मो से समान सापेक्षता के रूप में लिया जाता है। इस परिभाषा के अनुसार हमारा शासक वर्ग किसी भी या सभी धर्मो को समान रूप से प्रोत्‍साहन देकर सांप्रदायिकता की ताकतों को मजबूत करता है और उनसे वोट की लगातार भ्रष्‍ट होती गयी राजनीति की शतरंज खेलता है।


(लेख के अंतिम हिस्‍से का दूसरा भाग कल की पोस्‍ट में)



8 comments:

गिरिजेश राव said...

साँची बात। अगली कड़ी की प्रतीक्षा है यह जानने के लिए कि इतने बड़े धार्मिक देश में यूरोप के तर्क कैसे और कहाँ तक लागू होते हैं।

एक गम्भीर विषय छेड़ने के लिए धन्यवाद।

vijay gaur/विजय गौड़ said...

यह आलेख प्रस्तुत करने के लिए बहुत बहुत आभार मित्र। अफ़सोस कि साम्प्रदायिकता के सवाल पर इस तरह की बातचीत से क्यों बचा गया। बल्कि इस आलेख का जिक्र करने से भी गुरेज किया गया। हां, अभय कुमार दुबे द्वारा सम्पादित पुस्तक "साम्प्रदायिकता के स्रोत" में यह आलेख जरूर मिलता है।

अनुनाद सिंह said...

गोरख जी का यह लेख अत्यन्त मौलिक खोज है। ऐसे विचार ही निष्पक्ष विचार हैं। अभी तक यहाँ केवल एकपक्षीय विचार ही परोसे जाते रहे हैं। यह कदम स्वागतयोग्य है।

कहीं यह 'सर्वधर्मसमभाव' वाली व्याख्या 'मुस्लिम तुष्टीकरण' के लिये तो नहीं की गयी थी?

ali said...

लेख के अंतिम हिस्से का इन्तजार है !

Anonymous said...

एकदम वाज़िब प्रस्तुति...
‘धर्मनिरपेक्षता’ शब्द का इतना घालमेल कर दिया गया है कि क्या कहा जाए...

शब्दों में उलझाया जाता है, ताकि असली मंतव्य पृष्ठभूमि में, नेपथ्य में चले जाएं...

JAI SINGH said...

धन्‍यवाद कपिल।

चीजों को, और शब्‍दों को भी उनके इतिहास से काट कर देखने की वजह से बहुत सी समस्‍याएं पैदा होती हैं और विभ्रम फैलता है। तर्क और विज्ञान के बिना सांप्रदायिकता विरोध का कोई आधार ही नहीं हो सकता।

वैसे मुझे नहीं लगता कि विचारों को देशों की सीमाओं में कसकर बांध दिया जाना चाहिए। कोई खास विचार किसी खास वस्‍तुगत परिस्थिति‍ की उपज होता है, इसलिए जहां जहां एक जैसी परिस्थितियां होंगी वहां वहां एक जैसे विचार भी उत्‍पन्‍न होंगे।
क्‍या दुनिया को शून्‍य का प्रयोग करना इसलिए बंद कर देना चाहिए कि वह भारत में पैदा हुआ था और उनका अपना मौलिक विचार नहीं है। अगर हम आग, लोहा, भाप इंजन, पहिया और इंटरनेट सबका उपयोग करते हैं जो हमारे देश में पैदा तो नहीं हुए लेकिन हमारे लिए उपयोगी है तो फिर कहीं और पैदा हुए विचार को हम क्‍यों नहीं अपना सकते। वैसे तो जनतंत्र और संसद भी हमारे भारत की मौलिक खोज नहीं है पर हम उसका इस्‍तेमाल करते हैं और दुनिया का सबसे बड़ा जनतंत्र होने का ढिंढोरा भी पीटते हैं।
बड़ी मजेदार बात है कि लोग अपने फायदे वाली विदेशी चीजों का प्रयोग शान से करते हैं और जो चीज अपने को पसंद न आए विदेशी कहकर उसका बहिष्‍कार करते हैं।

देशी हो या विदेशी यदि सही है तो हमें आलोचनात्‍मक विवेक के साथ उसे अपनाने से गुरेज नहीं करना चाहिए।

गिरिजेश राव said...

@जय सिंह
जनतंत्र की खोज भारत में ही हुई थी। वैशाली पहला गणराज्य था जहाँ जन प्रतिनिधि शासन चलाते थे। समांतर रूप से यूरोप में भी यह अस्तित्त्व में आया लेकिन थोड़े समय के बाद।

किसी भी वाद को राष्ट्र के जन और उनकी सचाइयों से अलग कृत्रिम रूप से लागू करना घातक सिद्ध होता है। दूसरी कड़ी पढ़ने के बाद इस पर वृहद चर्चा होगी।

JAI SINGH said...

गिरिजेश जी बात मूल बात को न समझने के कारण आप गलत तर्क और उदाहरण पेश कर रहे हैं। आज का जनतंत्र और तबके जनतंत्र में बहुत बड़ा फर्क है। थोड़ा और सावधानी से आपने पढ़ा होता तो आपको पता चलात कि वैशाली के जनतंत्र में या पूंजीवाद के आने के पहले दुनिया के जितने भी जनतंत्र रहे उनमें सबके हक बराबर नहीं थे, वोट देने का अधिकार सबको नहीं था। ज्‍यादातर जगहों पर स्त्रियों को वोट देने का अधिकार नहीं था।

वैसे तो दुनिया के सारे प्रारंभिक कबीले जनतांत्रिक थे (मोटे तौर पर) और उनमें औरतों को भी वोट देने का अधिकार था।

आज हम जिस मताधिकार की बात कर रहे हैं वह सार्वभौमिक मताधिकार है जिसकी अवधारणा पूंजीवाद के युग के पहले मौजूद ही नहीं थी। न तो भारत में न दुनिया के किसी अन्‍य स्‍थान पर।
वैसे दोस्‍त जिस तरह आप ये कह रहे हैं कि जनतंत्र भारतीय चीज है विदेशी नहीं, उसी तरह हजार ऐसे उदाहरणों से बताया जा सकता है कि नास्तिकता, भौतिकता, धर्मविरोध, सामाजिक समानता के विचार भी किसी भी न किसी रूप में भारत में और दुनिया के बहुत से अन्‍य देशों में भी मौजूद रहे हैं, इसलिए आज इन विचारों को क्‍यों विदेशी कहा जाता है। हर नास्तिक और भौतिकवादी को समाज और देश विरोधी क्‍यों ठहराया जाता है जबकि हमारे देश में ही तमाम नास्तिक और भौतिकवादी चिंतक प्राचीन काल से ही मौजूद रहे हैं।

ध्‍यान देने की बात तो यह भी है कि जिस राष्‍ट्र के नाम पर अंधराष्‍ट्रवाद को बढ़ावा दिया जाता है वह राष्‍ट्र की विचारधारा भी एक विदेशी विचारधारा है।