'अब संसार में ''हिन्‍दू राष्‍ट्र'' नहीं हो सकता...' — गणेशशंकर विद्यार्थी

हमारे देश में सांप्रदायिकता से लड़ने वाले अग्रजों की कतार में निस्‍संदेह सबसे ऊपर शहीद गणेशशंकर विद्यार्थी का नाम लिया जा सकता है। वे हमें याद दिलाते हैं कि अपने विचारों के लिए जीना क्‍या होता है और प्रतिबद्धता के मायने क्‍या होते हैं। एक ऐसे दौर में जबकि मानवता के खिलाफ मानवद्रोही सांप्रदायिक ताकतें नये सिरे से महाविनाश की तैयारियों में लगी हैं, और दूसरी ओर इसके विरोध की प्रतिबद्धता का वैचारिक ठोसपन कमजोर हो रहा है, यह जरूरी हो जाता है कि प्रतिबद्धता के उदाहरण के तौर पर विद्यार्थीजी जैसे लोगों को इतिहास के पन्‍नों से निकाल कर आंखों के ऐन सामने रखा जाए, ताकि उनके विचारों की प्रेरणा हमें वर्तमान और भविष्‍य की चुनौतियों के लिए मार्ग दिखाती रहें....
प्रस्तुत है उनका यह छोटा सा उद्धरण...'अब संसार में ''हिन्दू राष्ट्र'' नहीं हो सकता...'‍‍

आज कुछ लोग ''हिन्‍दू राष्‍ट्र हिन्‍दू राष्‍ट्र'' चिल्‍लाते हैं। हमें क्षमा किया जाये—यदि हम कहें—नहीं; हम इस बात पर जोर दें कि वे एक बड़ी भारी भूल कर रहे हैं। और उन्‍होंने अभी तक ''राष्‍ट्र'' शब्‍द के अर्थ ही नहीं समझे। हम भविष्‍यवक्‍ता नहीं, पर अवस्‍था हमसे कहती है कि अब संसार में ''हिन्‍दू राष्‍ट्र'' नहीं हो सकता, क्‍योंकि राष्‍ट्र का होना उसी समय सम्‍भव है जब देश का शासन देशवालों के हाथ में हो। और यदि मान लिया जाये कि आज भारत स्‍वाधीन हो जाये या इंग्‍लैंड उसे औपनिवेशिक स्‍वराज्‍य दे दे, तो भी हिन्‍दू ही भारतीय राष्‍ट्र के सब कुछ न होंगे। और जो ऐसा समझते हैं—ह्रदय से या केवल लोगों को प्रसन्‍न करने के लिए—वे भूल कर रहे हैं और देश को हानि पहुंचा रहे हैं।
—साभार राहुल फाउण्‍डेशन, लखनऊ से प्रकाशित 'चुनी हुई रचनाएं' गणेशशंकर विद्यार्थी

25 comments:

Suresh Chiplunkar said...

पूरी तरह सहमत, एकमात्र नेपाल बचा था उसे भी खत्म कर दिया… अब कोई "हिन्दू राष्ट्र" नहीं होगा… "सेकुलरिज़्म" विचारधारा का गन्दा खून देश की नसों में इतना फ़ैल चुका है कि अब यह कभी तनकर सीधा खड़ा नहीं हो सकेगा… रेंगता ही रहा है, रेंगता ही रहेगा…

आनन्द वर्धन ओझा said...

विद्यार्थीजी के नामोल्लेख से ही मन एक अजीब-सी पवित्रता से भर जाता है. हुतात्मा ग. श. विद्यार्थी को भुलाकर हमने अपनी आत्मा को कमजोर किया है. आपका यह पावन-पूत स्मरण घोर अन्धकार में प्रेरणा का प्रकास फैलता रहे, यही कामना है.
ये जरूरी तो नहीं फिर भी उल्लेख कर दूँ कि विद्यार्थीजी से लेकर आजतक--तीन पीढियों तक--हमारा पारिवारिक सम्बन्ध बना हुआ है. विद्यार्थीजी की दोनों पौत्रिओं श्रीलेखा और मधुलेखा विद्यार्थी के निधन के बाद उस अपार साहित्यिक संपदा की देखभाल करने वालों में मैं भी शामिल हूँ. अचानक चिटठा जगत पर आपका आलेख देख मुझे अतीव प्रसन्नता हुयी है. साधुवाद !!

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

हिन्दू राष्ट्र न कभी था, न कभी होगा। वह केवल एक कल्पना है, लोगों को वास्तविकता से भटकाने के लिए।

संजय बेंगाणी said...

वह समय अब बित गया जब धर्म के आधार पर देश बनते थे. हिन्दु राष्ट्र न सही भारत से टूट कर किसी इस्लामी राष्ट्र बनने की सम्भावना पर क्या विचार है?

Suresh Chiplunkar said...

बेंगाणी जी से सहमत, हिन्दू राष्ट्र तो बनने से रहा, जिन-जिन राज्यों में, क्षेत्रों में, मुस्लिम आबादी बहुसंख्यक होते जायेंगे, वे इलाके एक-एक करके भारत से अलग होते जायेंगे… पहला नम्बर कश्मीर, फ़िर असम, फ़िर पश्चिम बंगाल और फ़िर केरल… (शायद अगले 50 साल में ही)… और यदि अलग न भी हो पाये तब भी देश की छाती पर बोझ बनकर अवश्य खड़े रहेंगे…। जय सेकुलरिज़्म, जय हो…

निशाचर said...

...........और जो ऐसा समझते हैं—ह्रदय से या केवल लोगों को प्रसन्‍न करने के लिए—वे भूल कर रहे हैं और देश को हानि पहुंचा रहे हैं।

पता नहीं विद्यार्थी जी ने ऐसा किस सन्दर्भ में कहा परन्तु यदि हिन्दू राष्ट्र की कल्पना मात्र से देश को हानि पहुँचती है तो फिर दुनिया में हिन्दुओं का अस्तित्व ही विश्व के लिए खतरा है........... इसका मिट जाना ही बेहतर है....... जय हो "सेकुलरिस्म अंकल" की

वैसे यह जिस फाउंडेशन की खोज है उसका भारत के कांग्रेसी युवराज से क्या सम्बन्ध है??

निशाचर said...

कभी इस्लामी फसिस्त्वाद या चर्च के साम्राज्यवाद के ऊपर भी चिंतन किया है या फिर केवल भगवाधारियों ने ही आपकी भैंस खोली है ...... अगर अपने देश, धर्म और संस्कृति से प्रेम और उसकी रक्षा का संकल्प फसिस्त्वाद है तो यही सही... कोई फर्क नहीं पड़ता..

मिहिरभोज said...

सही मुद्दा उठाया आपने वो भी गंणेश शंकर जी का नाम लेकर ....जय हो...दुनिया मे मुस्लिव राष्ट्र संभव है....गिनाऊं...ईसाई राष्ट्र संभव है ...आपको भी पता है... नहीं तो मैं मैल कर दूं....बस हिंदु राष्ट्र संभव नहीं है...क्यों कि आप हैं न इसे गलियाने लतियाने के लिए....और वाह वाह करने के लिए द्विवेदी जी...वाह

संदीप said...

भाई लोगों, कुतर्क करना बंद करो यार। अफगानिस्‍तान, ईराक, पाकिस्‍तान में सैक्‍युलर खून नहीं बह रहा ळै, फिर भी बेचारे रेंग रहे हैं, उसकी वजह तो जानते ही होंगे, यदि खबरें देखते होंगे तो।
वैसे हिंदू कट्टरपंथी, दलित विरोधी, स्‍त्री विरोधी, विज्ञान और तर्क विरोधी गंदा खून तो पहले से ही इस देश में है, धर्मनिरपेक्षता (कांग्रेस की नकली धर्मनिरपेक्षता नहीं) का इंजेक्‍शन लगता है, तो यह गंदा खून फैलाने वाले बाप-बाप चिल्‍लाने लगते हैं।
बेंगाणी जी, आपको इस ब्‍लॉग की किस पोस्‍ट में मुस्लिम राष्‍ट्र की बू आ गयी।
भाई निशाचर, नाम तो आपने अंधेरे के साम्राज्‍य वाला रख लिया है, लगता है इसलिए दिन के उजाले की तरह साफ चीजें भी नहीं दिखतीं। इस ब्‍लॉग पर कट्टरपंथियों की आलोचना की जाती है, जो कि फासीवाद का सिर्फ एक रूप हैं, सभी हिंदुओं को बार-बार क्‍यों घसीटते हो बंधु। गजब जबर्दस्‍ती और मनोगतता है। और हां, मित्रवर यह किसी फाउण्‍डेशन की खोज नहीं है, इसके बारे में गणेश शंकर विद्यार्थी के परिवार वालों, या नेशनल आर्काइव ही खोज लिये होते, तो शायद आपकी आंखें भी रात के अंधेरे में इस तरह मचमचाती नहीं। इसी ब्‍लॉग की पिछली कुछ पोस्‍ट पढ़ लोगे तो भारत के कथित युवराज और उनकी पार्टी के बारे में भी 'बर्बरता के विरुद्ध' की राय का पता चल जाएगा। लेकिन जहमत कौन करे, बस हिंदू शब्‍द देख कर गरियाने से फुर्सत मिले, और मनमाफिक अर्थ निकालने से फुर्सत मिले तब तो देखेंगे। वैसे फुर्सत मिलती तो इस्‍लामी फासीवाद या चर्च के साम्राज्‍यवाद के बारे में भी पढ लेते, खैर लगे रहिए।
मिहिरभोज जी, छो‍ड़ि‍ए भी, कहां मेल करने के चक्‍कर में पड़ गये आप, गरियाते रहिए। मुस्लिम राष्‍ट्रों और ईसाई राष्‍ट्रों के बारे में आपको तो पूरी पूरी जानकारी है न, उन राष्‍ट्रों की आम जनता की राय और स्थिति भी जान लीजिए। कुछ नहीं तो इंटरनेट ही खंगाल लीजिए।

varsha said...

बहुत उच्च स्तर की बहस चल रही है, मैं तो बस इतना कहने आई थी की जिस भूतकाल के दम पर हम किसी भी ज़मीन पर किसी भी जाती धर्म के लोगों के एकाधिकार की बात करते हैं उस इतिहास का कितना पुख्ता सबूत है हमारे पास? इतिहास को तो सभी देशों ने अपने हिसाब से लिखा है। ऐसे में क्यों न हम इन बेतुके मुद्दों को छोड़ दें और नए सिरे से नया धर्म बनाएं जिसमें हर दो पैरों से चलने वाला जीव शामिल हो सके। हाँ हम अपने अपने धर्मों का पालन करें पर दूसरे धर्मों की इज्ज़त भी करें, न की उन्हें मिटाने चल पड़ें (इस बात को हिंदू धर्म से बेहतर कोई नही समझता :))
माना की चंद दूसरे धर्मों के अनुयायी अन्य धर्मों के प्रति सहनशील नही, पर हम क्यों उनकी तरह बनें जब हमें पता है की वे ग़लत हैं। क्यों न हम उनके समक्ष एक उदाहरण पेश करें। इससे हमारे धर्म अर्थात हिंदू धर्म की गरिमा ही बढेगी।

JAI SINGH said...

हिंदू राष्‍ट्र बनाना भी संभव है बस इसके लिए इतिहास के पहिए को तीन-चार सौ साल पीछे ले जाना पड़ेगा। ईसाई, इस्‍लामी और यहूदी राष्‍ट्रों की हकीकत तो हमारे सामने है। क्‍या वहां की आम जनता बेहतर जीवन बिता रही है। क्‍या वहां के आम लोग कट्टरपंथी आग में झुलस नहीं रहे हैं। वही सब तो हिंदू राष्‍ट्र में भी होगा। हिंदू राजा ने नेपाल को दुनिया का वेश्‍यालय बना देने में कोई कसर छोड़ी थी क्‍या। ऐसा क्‍या खास था हिंदू राजा के नेपाल में कि उसको महिमामंडित किया जाए। खुद राजा के हाथ अपने भाई के ही परिवार के खून से रंगे हुए हैं। ऐसे हिंदू राजा पर तो हिंदुओं को भी शर्म आनी चाहिए।
आज सारी दुनिया धार्मिक कट्टरपंथ को छोड़कर आगे बढ़ने की लड़ाई लड़ रही है और हमें उस लड़ाई में सहयोग करना है न कि पूरी दुनिया को धार्मिक राष्‍ट्रों में बांटकर उन्‍हें आपस में लड़ाते रहने की साजिश करनी है।

जो धार्मिक आधार पर पहले से बने राष्‍ट्र हैं उनकी कुछ वजहें थीं जिनपर आज हममें से किसी का नियंत्रण नहीं था। और अब वक्‍त यह है कि उनको भी सुधारा जाए। न कि नए विभाजन पैदा किए जाएं नए विश्‍वयुद्ध और धर्मयुद्ध शुरू किए जाएं। अपने पुरखों के अपमान का बदला लेने में धरती को अभी और कई बार खून से सराबोर होना पड़ेगा और इसका कभी अंत नहीं होगा।
वैसे भी हिंदू राष्‍ट्र या किसी अन्‍य धर्म के राष्‍ट्र का मतलब क्‍या है - यही न कि उस धर्म विशेष के पूंजीपतियों की गुंडागर्दी। सामंतवाद में यह उस धर्म विशेष के सामंतों की सामंती थी आज के युग में पूंजीपतियों द्वारा शोषण होगा। तो भैया हमारा खून चाहे मुसलमान पूंजीपति चूसे या ईसाई या यहूदी या हिंदू या कोई और हमारे लिए तो एक ही बात है। फिर हिंदू राष्‍ट्र का महिमामंडन क्‍यों। क्‍यां हिंदू पूंजीपति ईसाई पूंजीपति से अच्‍छा होता है। क्‍या हिंदू बनिया ईसाई या मुसलमान बनिए से कम धांधली करता है। क्‍या हिंदू अफसर या नेता इसाई या मुसलमान अफसर या नेता से कम भ्रष्‍ट होता है। क्‍या हिंदू जमींदार मारता है तो कम चोट लगती है और दूसरे धर्म वाला मारता है तो ज्‍यादा चोट लगती है।
धर्म के नाम पर लफ्फाजी बंद करो (चाहे वो लफ्फाजी जिस भी धर्म, जाति, या नस्‍ल के नाम पर की जा रही हो) और बात को मुद्दे से भटकाओ मत। मनुष्‍यता को पुरानी गलतियों से सीखकर आगे बढ़ने दो पुरानी गलतियों को नए हाथों से दोहराओ मत वर्ना एक बार फिर बर्बरता के युग से शुरुआत करनी पड़ेगी।

varsha said...

जय सिंह जी ने तर्कों के माध्यम से अच्छी नसीहत भरी बात कही है, उम्मीद है धर्म निरपेक्षता का सही अर्थ हम समझ पायेंगे और सभ्यता के अगले चरण में जाने का प्रयत्न करेंगे न की इतिहास कुरेदेंगे। धर्म जब तक मुख्यधारा में रहेगा, सुख शान्ति मुख्यधारा में नही रहेगी।

संदीप said...

वर्षा जी, उम्‍मीद है कि आपकी बात कभी ये ''भाई लोग'' भी समझेंगे।

निशाचर said...

जनाब संदीप जी, लगता है सवाल जरा ज्यादा ही तीखा लगा इसलिए स्कूली बच्चों की तरह नाम और नामार्थ को लेकर मुंह बिराने वाली मुद्रा में आ गए. परन्तु सवाल अभी भी अपनी जगह कायम है.

बकौल आपके-
"साइबर जगत में हिटलर और मुसोलिनी के इन मानसपुत्रों की धमाचौकड़ी कुछ ज़्यादा ही बेरोकटोक है। इंटरनेट साइटों और ब्‍लॉगों पर ये लगातार अपना झूठ-पुराण फैलाते रहते हैं और अपना कूपमंडूकी दकियानूसी राग अलापते रहते हैं। इन्‍हें चुभने वाली कोई भी सच्‍ची, प्रगतिशील, जनपक्षधर बात सामने आते ही ये उस पर टूट पड़ते हैं और अपनी कौआ-रोर से उसे चुप कराने की कोशिश में जुट जाते हैं। ज़्यादातर लोग ''इनके मुँह कौन लगे?'' वाले अंदाज़ में अपनी शालीनता और भद्रता को सीने से लगाए चुपचाप किनारा कर जाते हैं।"

आपकी शालीनता का नमूना तो आपके तिलमिलाए हुए उत्तर से ही मिल गया है. जहाँ तक बात फासीवाद की है तो प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया में लाल कालीन इस कदर बिछ चुकी है कि उसे किसी दुसरे का पक्ष लिखना- दिखाना गवारा ही नहीं. साईबर जगत पर आपका बस नहीं लेकिन दूसरे विचारों से आपत्ति इतनी ज्यादा है की हिटलरी अंदाज में उस आवाज का गला घोंटने की मंशा रखतें हैं......... तुर्रा यह कि हम फासीवाद से लड़ रहें है....... शाबाश!!

हिंदूवादी समूहों को पानी पी-पीकर कोसने वाले इस्लामी कट्टरपंथ या चर्च के साम्राज्यवाद को जानने की फुर्सत नहीं रखते और इनका जिक्र भी करते है तो सिर्फ "आरती देने वाले अंदाज में" (कहीं आंच न लग जाए).

बानगी देखिये .........

"...........विज्ञान और वैज्ञानिकता की घोर विरोधी ये शक्तियाँ आधुनिक टेक्‍नोलॉजी का इस्‍तेमाल करने में कतई पीछे नहीं हैं। चाहे ये हमारे यहाँ के भगवापंथी फ़ासिस्‍ट हों या फिर अमेरिका के पैदा किए हुए तालिबानी कट्टरपंथी।"

बातें और भी हैं, फिक्र मत कीजिये अब तो आना-जाना लगा ही रहेगा......

संदीप said...

मित्रवर, आप ही लोगों के अंदाज में जवाब दिया तो आपको लगा कि आवाज चुप कराने का प्रयास कर रहा हूं, भई ऐसा करना होता तो टिप्‍पणी का विकल्‍प बंद कर सकता था, कम से कम इस साइट पर आप मनमाफिक नतीजे नहीं निकाते।
अब खुद ही देखिए न कि मैं चर्च या मुस्लिम कट्टरपंथ की आरती उतार रहा हूं (बक्रौल आपके) और मैं ही तालीबानी कट्टरपंथ की बात भी कर रहा हूं (आपने ही वह अंश भी दिया है)।
अब तक आप लोग (हो सकता है, व्‍यक्तिगत तौर पर आपने ऐसा न किया हो) विरोधी विचार सामने आते ही उस पर गाली गलौज के अंदाज में टूट पड़ते हैं, (याद नहीं तो रेयाज़, कपिल, द्विवेदी जी के ब्‍लॉगतथा खुद बर्बरता के विरुद्ध की पिछली कुछ पोस्‍ट ही देख लीजिए और पोस्‍ट ही क्‍यों केवल इस पोस्‍ट पर चिपलूनकर जी, मिहिरभोज जी की टिप्‍पणियां ही देख लीजिए, तिलमिलाहट और भाषा की शालीनता का अंदाज़ा लग जाएगा) अब आपको ठीक से जवाब दिया तो एक और मैडल जड़ दिया। खैर, यह भी संघी मानसिकता वालों का पुराना तरीका है।
और ''मित्रवर'' जवाब तो आपको जय सिंह जी, और वर्षा जी ने ही दे दिया, वैसे मैंने भी दिया, फिर भी आपको बूझा नहीं तो क्‍या किया जा सकता है। लगे रहिए।
वैसे मैं कांग्रेस के बारे में और जर्मनी, इटली के फासीवाद के बारे में लिखता रहा हूं, अपने ब्‍लॉग शब्‍दों की दुनिया में संसदीय वामपंथियों की लफ्फाजी, जनता की पीठ में चाकू मारने के बारे में के बारे में भी लिखता रहा हूं, लेकिन आप लोग उन पर तो ऐसी चुप्‍पी साधते हैं, जैसे सांप सूंघ गया हो। फिर आपके ''मतलब'' की पोस्‍ट आती है,तो बस पिल पड़े।
खैर लगे रहिए। इस ब्‍लॉग पर आपका स्‍वागत है, जब दिल करे, यहां पधार सकते हैं।

Secret Swan said...
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Secret Swan said...

प्रिय संदीप जी,
बड़े दिनों बाद आपको आपके ही ब्लॉग पर देख कर मन प्रसन्न हो गया.आशा है की आप मुझे भूले नहीं होंगे.आपकी पिछली पोस्ट पर मुलाकात हो चुकी है हमारी.पर आपसे ये शिकायत है की अगर कोई बात छेड़ते हैं तो पूरी करके ही दम लिया करें.बीच में मैदान छोड़ कर क्यूँ भाग जाते हैं?? उम्मीद करता हूँ की इस बार असली कम्युनिस्ट योद्धा की तरह पेश आएँगे.. आपकी आज्ञा हो तो मैं अपने विचार रखूं.

संदीप said...

सीक्रेट स्‍वान भाई, आप लगता है मिथुन की फिल्‍में बहुत देखते रहे हैं, तभी तो ऐसा फिल्‍मी डायलॉग चिपकाया है। खैर, इस पोस्‍ट से संबंधित कोई बातचीत करनी हो तो स्‍वागत है। लेकिन जवाब देने में देर हो तो अधीर मत होना मित्र, कुछ जरूरी काम निपटाने हैं। अरे हां, आपकी शिकायत का सबब नहीं पता चला।

Secret Swan said...

अभी तक शिकायत का सबब नहीं पता चला तो लगता है आप पहचान नहीं पाए.कहिये तो लिंक भेज दूँ आपकी हिन्दू बर्बरता वाली पोस्ट का.जिसमें थोड़े समय तक मुकाबला करने के बाद आप न जाने कहाँ छुप गए थे एवं मेरे द्वारा उठाये गए प्रश्नों का अभी तक उत्तर नहीं दिया.

JAI SINGH said...

निशाचर जी प्रश्‍न तो मेरा भी अपनी जगह पर कायम है।

संदीप said...

हा हा, अभी पिछली पोस्‍ट देखी याद आ गया भाई। बिल्‍कुल याद आ गया। वैसे संघ की समझ और उसकी असलियत के बारे में जल्‍द ही लिखूंगा, तब आपके सभी सवालों का जवाब मिल जाएगा। वैसे मैं जानता हूं, कि आप संघ की भक्ति के चलते तर्कों को नहीं मानेंगे। मैंने उसी पोस्‍ट की टिप्‍पणी में एक बार आपको जवाब दिया था,‍िजसका आपने मनमाना अर्थ निकाला था। अब उसका तो कोई इलाज नहीं है मित्र। खैर, लगे रहिए।

Secret Swan said...

आपके उस लेख का इंतजार रहेगा.एवं आपको इस पोस्ट का उत्तर भी जल्द ही मिल जायेगा.अभी क्षमा चाहता हूँ.

संदीप said...

अरे क्षमा क्‍यों मांगते हैं ''मैदान छोड़ कर भागने'' का अधिकार आपको भी है।
खैर यह तो मजाक था, लेकिन आपका हमेशा ''स्‍वागत'' है।

निशाचर said...

जय सिंह जी, आपके सवाल का जवाब विस्तार से देने के लिए एक पोस्ट लिख रहा हूँ. जरा रोजी-रोटी ने उलझा रखा है. आशा है इस नैसर्गिक आवश्यकता हेतु विलंब क्षम्य होगा.

Secret Swan said...

प्रिय संदीप जी,
विलंब के लिए क्षमा चाहता हूँ.कुछ कामों में व्यस्त था.विद्यार्थी जी की मैं इज्जत करता हूँ.लेकिन फिर भी उनके कुछ विचारों से मेरी असहमति है.
विद्यार्थी जी एवं उनके जैसे विचारों वाले लोग कहते हैं की 'हिन्दू राष्ट्र' चिल्लाने वाले लोग राष्ट्र का अर्थ नहीं समझे. लेकिन सच्चाई ये है की विद्यार्थी जैसे लोगों ने कभी 'हिन्दू' का अर्थ नहीं समझा. हिन्दू कोई पंथ नहीं है,ये तो कला है जिंदगी जीने की.ये ही एकमात्र धर्म है जिसका कोई उदगम ज्ञात नहीं है.ये ही एकमात्र धर्म है जो सनातन है, सिन्धु(Indus) नदी के किनारे पर फैली हुई सभ्यता से ही हिन्दू नाम पड़ा.
सिन्धु नदी के किनारे बसी पूरी सभ्यता के पूर्वज हिन्दू ही थे.धर्म परिवर्तन करके मुस्लिम,ईसाई बने सभी लोगों के पूर्वज हिन्दू ही थे. 'वसुधैव कुटुम्बकम' एवं 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' ये हिन्दू धर्म की ही दें है. ये हिन्दू धर्म की ही संस्कृति है की आज भी यहाँ दुसरे धर्मों के लोगों को समान अधिकार मिले हुए हैं. मुस्लिमों की तरह दुसरे धर्मों के अनुयायियों के लिए 'काफिर' जैसा कोई शब्द हिन्दू धर्म में नहीं है. दूसरे धर्मों के अनुयायिओं के लिए जजिया कर जैसा कोई प्राविधान किसी हिन्दू राजा के राज्य में नहीं था.
अगर ऐसा ही चलता रहता तो कोई समस्या नहीं थी.समस्या उत्पन्न हुई जब ईसाई एवं मुस्लिमों ने लालच देकर या बल प्रयोग कर धर्म परिवर्तन शुरू किया. अपनी जनसँख्या बढाकर अलगाववाद की मांगें उठाना शुरू कर दिया. एक धर्मनिरपेक्ष देश में अपने लिए ज्यादा अधिकार मांगने शुरू कर दिए. आखिर मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड का औचित्य ही क्या है. क्या भारत का संविधान सक्षम नहीं इनके विवादों के निराकरण के लिए??? इसलिए हिन्दू राष्ट्र का अर्थ ये नहीं की यहाँ किसी दूसरे धर्म के लोगों के लिए कोई स्थान नहीं. यहाँ सभी रह सकते हैं पर समान अधिकारों के साथ, धर्म के आधार पर कोई भेद-भाव नहीं होना चाहिए. बस यही हमारी मांग है.
संघ जब यही प्रश्न उठाता है तो आप जैसे खड़े हो जाते हैं विरोध के लिए.आखिर अपने विरोध का एक तो कारण बताइए.