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इंडियन मुजाहिदीन पर सरकार श्वेत पत्र जारी करे


मालेगांव बम धमाकों,न्यायिक साम्प्रादायिकता और इंडियन मुजाहिद्दीन का सच विषयक सम्मेलन में आतंकवाद के मसलों पर न्यायपालिका की बढ़ती साम्प्रादायिक प्रवृत्ति पर चिंता जाहिर की गई। वहीं इंडियन मुजाहिद्दीन के अस्तित्व पर सवाल उठाने हुए वक्ताओं ने इस पर केंद्र सरकार से श्वेतपत्र जारी करने की मांग की।
प्रेस क्लब में आयोजित इस सम्मेलन में वरिष्ठ पत्रकार सुभाष गाताड़े ने पिछले दिनों मालेगांव बम धमाकों के दो अभियुक्तों कलसांगड़ा और साहू की जमानत पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब न्यायपालिका इस बात को मानती है कि इन दोनों को मालेगांव विस्फोट के षड़यंत्र की जानकारी थी बावजूद इसके इनको छोड़ दिया गया। जबकि उसी मामले में असीमानंद की स्वीकारोक्ति के बावजूद अभी भी 9 मुस्लिम निर्दाेष बच्चे जेलों में बंद है। इसे न्यायिक साम्प्रादायिकता नहीं तो क्या कहा जायेगा। उन्होंने कहा कि सुब्रमण्यम स्वामी मुसलमानों से मताधिकार छीन लेने की बात करते हैं,बावजूद इसके न तो उनके खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई होती है और न ही अपने को सेकुलर कहने वाली केंद्र सरकार ने कुछ किया।
 
मैग्सेसे सम्मान प्राप्त सामाजिक कार्यकर्ता संदीप पाण्डेय ने कहा कि यह एक गंभीर सवाल है कि बाटला हाउस एनकाउंटर को सरकार अपनी उपलब्धि बताती है,जबकि सभी जांच रिपोर्ट व नागरिक समाज इसे फर्जी एनकाउंटर बताता है। इससे जाहिर है कि यह सरकार आतंकवाद के सवाल पर किस साम्प्रदायिक जेहनियत से सोचती है। उन्होंने कहा कि कानपुर में बजरंग दल के दो लोग बम बनाते हुए उड़ गये बावजूद इसके सरकार ने कोई गंभीर जांच नहीं कराई जबकि सिर्फ शक के आधार पर बिना किसी ठोस आधार पर सैकड़ों मुस्लिम नौजवान जेलों में बंद हैं।
 
वेलफेयर पार्टी ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुस्तफा फारूक ने कहाकि  आतंकी विस्फोटों की राजनीति के मूल मंा मुसलमानों के खिलाफ सुनियोजित तरीके से पैदा किये गये अविश्वास की राजनीति से जुड़ा है। उन्होंने कहा कि एटीएस के आरोप के ही मुताबिक कर्नल पुरोहित ने एक हजार लोगों को विस्फोट करने की ट्रेनिंग दी। बावजूद इसके आज तक उनकी शिनाख्त इंटलिजेंस ने क्यों नहीं करवायी।
वरिष्ठ पत्रकार अजीत साही ने कहा कि जब राज्य की आतंकवाद में संलिप्तता उजागर हो रही है,जिसे गुजरात से लेकर तमाम जगहों पर देखा गया है,तो ऐसे में इंडियन मुजाहिद्दीन नाम के जिस संगठन के सहारे आतंकवाद का हौव्वा खड़ा किया गया है,जिसका कोई आधार नहीं है, की साजिश को ध्वस्त करने के लिए सिविल सोसायटी को एक राजनैतिक अभियान शुरू करने की जरूरत है। उन्होंने यह भी कहा कि इंडियन मुजाहिद्दीन नाम का कोई संगठन है कि नहीं या फिर यह खूफिया एजेसिंयों के द्वारा रचा गया संगटन है,इसकी जांच किये जाने की आवश्यकता है।
सामाजिक कार्यकर्ता व पत्रकार अनिल चामड़िया ने ज्यूडियल सिस्टम में गवाही व तर्काे को खारिज करने की प्रवृत्ति पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि राज्य आतंकवाद का खांचा खड़ा करता है और ज्यूडिशियल सिस्टम उसे मान्यता देने का काम करता है। जो लोकतंत्र के लिए खतरनाक है।
 
पूर्व पुलिस अधिकारी और पीयूसीएल के प्रदेश उपाध्यक्ष एसआर दारापुरी ने कहा कि राज्य अपनी जरुरत के हिसाब से समय-समय पर खूफिया विभाग द्वारा कुछ कागजी संगठन बनाकर अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न का खेल खेलता है। इंडियन मुजाहिदीन भी इसी फार्मूले के तहत बनाया गया कागजी संगठन लगता है। इसीलिए सरकार कभी उसे सिमी से जोड़ती है तो कभी किसी और संगठन से।
 
कार्यक्रम का आरंभ राजीव यादव ने  कहा कि आश्चर्य की बात है कि जिस आईएम को सिमी का मुखौटा बताया जा रहा है उसको सरकारी दस्तावेज ही खारिज कर रहे हैं, क्योंकि उसका जिक्र सिमी के प्रतिबंध वाले नोटिफिकेशन जो फरवरी 2006 के बाद और चौथी बार प्रतिबंधित किए जाने से पहले 2008 की सूची में नहीं है। यह एक अहम सवाल है, क्यों कि 2008 के जयपुर, अहमदाबाद और दिल्ली के धमाकों के दौर में फलक पर आए आईएम पर जो भी आरोप हैं या उस दौर में जो भी प्रमुख गिरफ्तारियां हुईं वो सिमी के पुराने सदस्यों की। अगर 2008 में यह स्पष्ट हो गया था कि आईएम सिमी का मुखौटा है तो फिर उसका नाम क्यों सिमी द्वारा संचालित संगठनों की सूची में नहीं है? पिछले दिनों मुंबई धमाके के बाद पूरे देश में सिमी के पुराने सदस्यों को इसी आधार पर पूछताछ के लिए उठाया गया और इसी प्रक्रिया में मुंबई में फैज उस्मानी नाम के व्यक्ति की पुलिस पूछताछ में दी गई प्रताड़ना से मौत हो गई।
 
मो0 शोएब ने संचालन करते हुए कहा कि आज यह कनवेंशन ऐसे दौर में हो रहा है जब एक ऐसे संग्ठन जिसके अस्तित्व पर ही सवाल है पर उसके नाम पर पूरे देश में जगह-जगह मुस्लिम युवकों का मानवाधिकार हनन किया जा रहा है।
 
मसीहुद्दीन संजरी ने विस्फोट के आरोपों में बंद मुस्लिम नौजवानों की न्यायिक प्रक्रिया पर अपना अनुभव रखा। उन्होंने कहा कि जिस तरह मुंबई धमाकों के बाद एटीएस ने रांची से एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया और दर्जनों अन्य को संदिग्ध बताया उससे भी राज्य की मंशा को समझा जा सकता है कि वह नक्सल और इस्लामी आतंकवाद को जोड़ने के फार्मूले पर काम कर रहा है जो उसकी पुरानी रणनीति का हिस्सा है।
 
श्रमजीवी पत्रकार संध के अध्यक्ष ने कहा कि जब इतने सवाल उठ रहे हैं तो मीडिया को भी आईबी और पुलिस के तर्कों को ही एकतरफा तरीके से छापने से बाज आना चाहिए क्योंकि पत्रकारिता अगर राज्य मसीनरी और खूफिया विभाग का प्रवक्ता बन जाएगा तो पत्रकारिता की विश्वसनियता खत्म हो जाएगी।  अंत में रविशेखर ने कार्यक्रम में प्रस्ताव रखा-
 
1.इंडियन मुजाहिद्दीन पर सरकार श्वेत पत्र जारी करे कि ये क्या है और किसका संगठन है
 
2.संघ परिवार और हिंदुत्ववादी संगठनों की संलिप्तता वाले आतंकी घटनाओं पर चल रही जांच पर श्वेत पत्र आये
 
3.पिछले 10 साल की सभी आतंकी घटनाओं पर एक अलग कमीशन गठित किया जाये।
 
4.अभिनव भारत,सनातन संस्था,हिन्दू युवा वाहिनी,हिन्दू जनजागरण समिति और बजरंग दल पर प्रतिबंध लगाया जाये
 
5.संघ परिवार के नेता इंद्रेश कुमार की गिरफ्तारी की जाये।
 
6.आर डी निमेश कमीशन जो 6 महीने के लिए बनी थी और जिसने तारिक-खालिद प्रकरण पर रिपोर्ट देने थी,वह चार साल बाद भी क्यों नही आयी।
 
7. आरटीआई के तहत सबूत मिलने के बावजूद कि खालिद को गलत तरीके से उठाया गया,उसपर जस्टिस अश्वनी कुमार की अदालत ने डेढ़ वर्षों से क्यों जमानत अर्जी को लंबित कर रखा है।
 
कार्यक्रम में रणधीर सिंह सुमन, अरूंधति धुरू,रुपरेखा वर्मा, निशांत, हरेराम मिश्रा, रश्मि काला ,एकता सिंह, अजय सिंह,ताहिरा हसन,जावेद मोहम्मद, शाहनवाज आलम, जहीर आलम फलाही, के के वत्स, महेंद्र सिंह, तारिक शफीक, गुंजन सिंह आदि लोगों ने शिरकत की।

धर्म, सांप्रदायिकता और धर्म-निरपेक्षता : गोरख पाण्‍डेय (भाग दो)

'धर्म-निरपेक्षता' शब्‍द को उसके असली अर्थ में समझने की ज़रूरत आज पहले से ज्‍यादा मौजूद हैं। चूंकि इसी शब्‍द की आड़ में खोखली धर्म-निरपेक्षता गढ़ी और इस्‍तेमाल की गई वहीं सांप्रदायिकता के विरोध के लिए भी इसी गत्ते की तलवार का इस्‍तेमाल तथाकथित प्रगतिशील तबका करता आ रहा है। नतीजे भी सामने हैं जबकि आज सांप्रदायिकता के विरोध का कोई सशक्‍त वैचारिक-राजनीतिक-सामाजिक आधार मौजूद नहीं है। कल की पोस्‍ट की सबसे जरूरी बात हमें यह समझ आई कि ''धर्म-निरपेक्षता राज्‍य का एक गुण होना चाहिए।' राज्‍य के इस मूल चरित्र पर ध्‍यान देने की जरूरत है। इस मूल बात को समझते हुए प्रस्‍तुत है लेख के इस हिस्‍से का दूसरा और अंतिम भाग। इस लेख की अहमियत की वजह से हम इसे जल्‍द ही पूरा प्रस्‍तुत करेंगे, साथ ही इस मुद्दे पर तो बात जारी ही रहेगी...



धर्म, सांप्रदायिकता और धर्म-निरपेक्षता


— गोरख पाण्‍डेय


इस स्थिति का फायदा उठा कर कुछ लोग धर्म-निरपेक्षता की जरूरत से ही इनकार करने लगे हैं। वे कहते हैं कि भारत धर्म और सम्‍प्रदायों का देश है और धर्म-निरपेक्षता यहां की प्रकृति के अनुकूल नहीं है। उनके तर्क पर चला जाए तो हमें यूरोप से प्राप्‍त आधुनिक विज्ञान, तकनालाजी तथा लोकतंत्र और समाजवाद की धारणाओं से भी मुक्‍त हो जाना चाहिए। ऐसी हालत में जो हमारे पास बच जायेगा, वह वर्गों और वर्णों में विभाजित, मध्‍य-युगीन और अस्‍पृश्‍यता के काले धब्‍बों से भरा जर्जर समाज होगा या फिर हिन्‍दू साम्‍प्रदायिकता के वर्चस्‍व से नियंत्रित एक ऐसा राज्‍य-तंत्र जो अपने मूल आशय में फासिज्‍म का भारतीय रूप होगा। साम्‍प्रदायिकता की विघटनकारी परिणतियों से परिचित कोई भी व्‍यक्ति इन दोनों विकल्‍पों को स्‍वीकार नहीं करेगा।


जहां तक परम्‍परा का सवाल है, भारत में धार्मिक और साम्‍प्रदायिक चिन्‍तन के अलावा, और उसके खिलाफ, बुद्धिवादी और भौतिकवादी चिनतन की एक मजबूत परंपरा रही है। बुद्ध के समय में चिन्‍तन के तमाम रूप सक्रिय थे और अधिकांश बुद्धिवादी तथा भौतिकवादी थे। खुद बुद्ध ने ईश्‍वर की धारणा का निषेध करके आत्‍मवादी चिंतन पर गंभीर प्रहार किया। चाणक्‍य का प्रसिद्ध अर्थशास्‍त्र अपनी मूल संरचना में एक धर्म-निरपेक्ष कृति है। बाद में मुगल बादशाह अकबर ने एक खास तरह की धर्म-निरपेक्षता बरतने की कोशिश की। असली मुद्दा यह है कि आप परम्‍परा में से क्‍या चुनते हैं और वर्तमान में आपका पक्ष क्‍या है?


अब समय आ गया है कि धर्म-निरपेक्षता को उसके स‍ही परिप्रेक्ष्‍य में देखा जाये और जनता की एकता तथा उसके जनवादी आन्‍दोलन के सामने खतरा बन रही तानाशाही और सांप्रदायिकता की शक्तियों का मुकाबला किया जाए।


धर्म, सांप्रदायिकता और धर्म-निरपेक्षता : गोरख पाण्‍डेय

धर्म-निरपेक्षता क्‍या है? या हमारे यहां सेक्‍युलरिज्‍म सांप्रदायिकता से लड़ते हुए इतना खोखला, नकली और निरीह क्‍यों नजर आता है? इसकी वजह हमें यह समझ आती है कि धर्म-निरपेक्षता को उसके असली अर्थों में हमने ग्रहण ही नहीं किया। प्रगतिशील कहे जाने वाले तबके ने भी उसकी उसी परिभाषा (सर्वधर्मसमभाव वाली) को आंख मूंद कर स्‍वीकार कर लिया जो शासक वर्ग की जरूरतों के हिसाब से गढ़ी गयी थी। हम चाहते हैं कि धर्म-निरपेक्षता के असली अर्थ और उसके मूल्‍यों पर नये सिरे से समझ बनाये जाने की जरूरत है। इस समझ के लिए जरूरी बहस-मुबाहिसे के लिए हम यहां गोरख पाण्‍डेय का इस विषय पर एक महत्‍वपूर्ण लेख धर्म, सांप्रदायिकता और धर्म-निरपेक्षता, (साभार परिवेश पत्रिका) के अंतिम हिस्‍से का पहला भाग दे रहे हैं। हम उम्‍मीद करते हैं कि धर्म-निरपेक्षता को उसके असली अर्थ में समझने की एक ईमानदार शुरुआत की जाएगी...



धर्म, सांप्रदायिकता और धर्म-निरपेक्षता


— गोरख पाण्‍डेय



धर्म-निरपेक्षता क्‍या है? क्‍या यह सर्वधर्मसमभाव है? क्‍या आप धार्मिक भी बने रह सकते हैं और धर्म-निरपेक्ष भी? कोई भी धार्मिक व्‍यक्ति या व्‍यक्तियों का समूह सर्वधर्मसमभाव के अर्थ में धर्म-निरपेक्ष नहीं हो सकता। क्‍योंकि उसका अपना एक धर्म है और उसके लिए दूसरे धर्म पराये हैं। असल में धार्मिकता और धर्म-निरपेक्षता एक साथ नहीं चल सकतीं।


यूरोप के आधुनिक इतिहास पर गौर करें तो पायेंगे कि वहां इसकी धारणा सीधे धर्म के विरोध में विकसित हुई। दूसरे लोक की कल्‍पना को नकारना और इस लोक या यथार्थ को इसी के नियमों के आधार पर व्‍याख्‍यायित करना चिन्‍तन का इहलौकिकीकरण (सेक्‍युलराइजेशन) माना गया।


इस अर्थ में धर्म-निरपेक्षता चिन्‍तन की वह प्रवृत्ति है जो विज्ञान और बुद्धिवाद के आधार पर विकसित होती है, अनुभव, तर्क और प्रयोग पर बल देती है और धार्मिक चिन्‍तन की अबौद्धिक पारलौकिकता का निषेध करती है। इसके साथ यूरोप के इतिहास का यह तथ्‍य भी जुड़ा हुआ है कि मध्‍य-युग में राज्‍य के ऊपर धर्म (चर्च) की स्‍थापित सत्ता को चुनौती देना और राज्‍य के समस्‍त इहलौकिक क्रिया-कलाप से धर्म को अलग कर देना भी क्रमश: धर्म-निरपेक्षता का एक रूप बन गया। धर्म-निरपेक्षता राज्‍य के एक गुण के रूप में विकसित हुई जिसके अनुसार वह धर्म को व्‍यक्तिगत सरोकार मानेगा, सामाजिक संबंधों से धर्म को अलग करेगा और धर्म के आधार पर किसी को विशेषाधिकार न प्रदान करेगा। इसका आशय यह भी है कि धर्म-निरपेक्ष राज्‍य अपनी विचारधारा निर्मित और प्रचारित करेगा, बुद्धि और तर्क को प्रोत्‍साहन देगा और धार्मिक चेतना के आग्रहों को अप्रासंगिक बनाता जायेगा।


अपने देश में धर्म-निरपेक्षता की जो परिभाषा फैलायी गयी, वह धार्मिकता के ज्‍यादा करीब थी। इसे सर्वधर्मसमभाव या धर्मो से समान सापेक्षता के रूप में लिया जाता है। इस परिभाषा के अनुसार हमारा शासक वर्ग किसी भी या सभी धर्मो को समान रूप से प्रोत्‍साहन देकर सांप्रदायिकता की ताकतों को मजबूत करता है और उनसे वोट की लगातार भ्रष्‍ट होती गयी राजनीति की शतरंज खेलता है।


(लेख के अंतिम हिस्‍से का दूसरा भाग कल की पोस्‍ट में)



चुनावों में कांग्रेस की जीत से फासीवाद का खतरा कम नहीं होगा

चुनावी धमाचौकड़ी खत्म हो चुकी है, और कांग्रेस के नेतृत्व में 79 मंत्रियों वाली सरकार भी अस्तिव में आ गई है। अपनी हार के बावजूद संसदीय वामपंथियों से लेकर कई बुद्धिजीवी तक इसे धर्मनिरपेक्ष ताकतों की जीत और सांप्रदायिक ताकतों की हार बता रहे हैं, जैसा कि पिछले आम चुनाव में कांग्रेस की जीत के बाद किया गया था। खुद कांग्रेस भी ''धर्मनिरपेक्ष'' ताकतों को जिताने के लिए जनता को धन्यवाद करती फिर रही है। लेकिन संसदीय चुनाव में कांग्रेस को बहुमत मिलना धर्मनिरपेक्ष ताकतों की जीत नहीं है। चुनावी खेल में कोई भी जीते, उससे फासीवाद को जुकाम तक नहीं होगा, उसका अंत या पतन तो दूर की बात है।

तमाम चुनावी मजमेबाजों और नेहरूवादी धर्मनिरपेक्षता के अनुयायियों की सतमेल खिचड़ी धार्मिक उग्रवादियों का मुकाबला नहीं कर सकती। 'सर्वधर्मसमभाव' के भजन-कीर्तनों से हम पुनत्थानवादी ताकतों के बढ़ते सामाजिक आधार और प्रभाव को रत्तीभर भी कम नहीं कर सकते। यह नहीं भूला जा सकता कि सभी चुनावी पार्टियां अपने-अपने वोट-बैंक के लिए जाति-धर्म के झगड़ों को तूल देती रही हैं, जनता को बांटती रही हैं और कूड़े-कचरे का वह ढेर इकट्ठा करती रही हैं जिस पर निरंकुश सामाजिक प्रवृत्तियों की तमाम विषबेल उगी हैं और हिन्दूं कट्टरपंथ का मानवभक्षी पौधा पनपा है।
ऐसे में
यह भूलना भी आत्‍मघाती होगा कि कांग्रेस ने ही पंजाब में धनी किसानों की पार्टी अकाली दल की धार्मिक भावनाओं पर कायम राजनीतिक आधार को खिसकाने के लिए भिण्डरांवाले को पैदा किया और जब वह उनके लिए ही भस्माओसुर बन गया तो उसे समाप्त करने के साथ ही पूरे पंजाब में आतंक राज कायम किया गया था। वी.पी. सिंह और चंद्रशेखर की सरकारों ने भी पंजाब की आंच पर अपनी चुनावी रोटियां सेंकने से अधिक कुछ नहीं किया। यही नहीं, इंदिरा गांधी-राजीव गांधी के समय से ही कांग्रेस भी 'हिंदू-कार्ड' खेलने की कोशिश करती रही है और इसकी सफलता में संदेह होने पर शाहबानो प्रकरण जैसे मामलों में मुस्लिम कट्टरपंथी ताकतों का तुष्टिकरण करके खोये हुए अल्पासंख्यक वोटों को फिर से अपनी झोली में डालने की कोशिशें भी करती रही है। अयोध्या में राम जन्मभूमि का ताला खुलने से लेकर अब तक की घटनाओं में केवल राजीव गांधी-नरसिंह राव की सरकारों की ही नहीं बल्कि वी.पी. सिंह-चंद्रशेखर की सरकारों की भी भूमिका भी रही है।

अब एक नजर संसदीय वामपंथ पर।
संसदीय वामपंथ के लिल्ली घोड़े पर सवार गत्ते की तलवारें भांजते ''रणबांकुरे'' साम्प्रदायिक फासीवाद-विरोधी अपनी तथाकथित प्रचारात्मक-आन्दोलनात्मक कार्रवाइयों को महानगरीय मध्यवर्ग के छोटे से हिस्सेर में सीमित रखते हैं। व्यापक मेहनतकश आबादी तो दूर की बात है, महानगरों से लेकर छोटे शहरों-कस्बों की निम्ने मध्यवर्गीय युवाओं तक सामने भी संसदीय वामपंथी दल फासीवाद-विरोधी संघर्ष की तैयारी का कार्यक्रम तो दूर, आम दिशा तक प्रस्तुरत नहीं कर सके हैं। इनकी रणनीति संसद में ''तीसरी ताकतों'' के भाजपा विरोध की मामा-गोटी खेलने से लेकर कांग्रेस को समर्थन देने तक ही मुख्यत: सीमित है।
पिछली सरकार में समर्थन के दौरान भी इन्होंने फासीवाद के खिलाफ जनता को जागृत-गोलबंद करने के लिए कुछ नहीं, सिवाय भाषणबाजी और बयानबाजी के। वैसे भी संसदीय वामपंथी सारी सीटों पर काबिज हो जाएं, तो भी फासीवाद खत्म नहीं हो जाएगा। फासीवादी ताकतें लगातार अपना काम कर रही हैं, भले ही इन आम चुनावों में हार से धार्मिक कट्टरपंथी थोड़ी देर के लिए शांत हो जाएं, लेकिन इस पराजय के चलते फासिस्ट ताकतें पहले से और ज्यामदा आक्रामक होकर भाषाई, धार्मिक अल्पलसंख्यों, दलितों, स्त्रियों के खिलाफ जहर उगलने का अपना घिनौना काम शुरू कर देंगी, ताकि अगले चुनावों में इस जहर से पोषित फसल काटी जा सके।
अब इन चुनावबाज पार्टियों से इतर बात की जाए, तो दरअसल, विश्व स्तर पर आर्थिक कट्टरपंथ या मूलतत्ववाद की वापसी ने राजनीतिक-सामाजिक स्तर पर भी कट्टरपंथ के लिए जमीन तैयार की है जिसकी तार्किक परिणति-फासीवादी धाराओं के नये सिरे से फलने-फूलने के रूप में सामने आ रही है।
हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि सेवानिवृत्त होकर ''बुद्धत्त्‍व'' प्राप्त करने के बाद पूर्व राष्ट्रपति वेंकटरमण ने भी यह वक्तव्य दिया था कि वर्तमान आर्थिक नीतियों को एक फासिस्ट राजनीतिक ढांचे में ही पूरी तरह लागू किया जा सकता है।

वैसे भी भारत हिन्दुनत्व वादी साम्प्रदायिक फासीवाद के प्रभाव-विस्तार का इतिहास भारतीय पूंजीवाद के पराभव और पतन के इतिहास का ही एक अध्यावय है। भारत में पूंजीवादी जनवाद और धर्मनिरपेक्षता का आधार शुरू से ही कमजोर रहा है तथा सांस्‍कृतिक पुरातनपंथ, अतीतोन्‍मुखता और सर्वसत्तावादी धार्मिक विचारों की एक सशक्त परमम्परा समाज में मौजूद रही है।
यहां पर कलेशी और प्रभात पटनायक की इस स्थापना का उल्लेख करना मौजूं होगा कि : फासीवादी ताकतें सत्ता में रहें न रहें, राजनीतिक और सामाजिक तानेबाने में उनकी उपस्थिति कष्टदायक हृदय-कैंसर के रूप में बनी रहेगी क्योंकि जहां फासीवाद के सत्ता में रहने की आवश्यकता साम्राज्यवाद या बड़ी पूंजी की नजर से फिलवक्त अधिक नहीं है, वहीं ये लोग फासीवाद को सिर पर तलवार की तरह लटकाये रखना भी आवश्यबक मानते हैं।
अंत में, साम्प्रदायिकता की समस्या का समाधान नेहरूवादी धर्मनिरपेक्षता या सर्वधर्मसमभाव के नारे में नहीं, बल्कि ऐसी सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था में होगा जिसमें धर्म लोगों का व्यक्तिगत‍ विश्वासमात्र हो, शिक्षा, संचार माध्यमों और राजनीतिक सहित सामाजिक जीवन के किसी भी क्षेत्र में उसका लेशमात्र दखल न हो तथा जिसमें वैज्ञानिक जीवन-दृष्टि समाज की मार्गदर्शक शक्ति हो। धार्मिक कट्टपंथ विरोधी संघर्ष के लिए हमें आज सबसे पहले जागरूक प्रबुद्ध नागरिकों को संगठित करना होगा, फिर जनता के सभी वर्गों की नुमाइन्दगी करने वाली प्रगतिशील ताकतों का संयुक्त मोर्चा बनाना होगा और फिर फासीवाद के खिलाफ फैसलाकुन लड़ाई के लिए व्यापक जनता को संगठित करना होगा।