''देसी'' हिंदुत्‍व के विदेशी संबंध और प्रभाव

उग्र हिंदुत्‍व को समझने के लिए, हमें भारत में उसकी जड़ों के साथ ही उसके विदेशी संबंधों-प्रभावों की पड़ताल करनी होगी। 1930 में हिंदू राष्‍ट्रवाद ने 'भिन्‍न' लोगों को 'दुश्‍मनों' में रूपांतरित करने का विचार यूरोपीय फ़ासीवाद से उधार लिया। उग्र हिंदुत्‍व के नेताओं ने मुसोलिनी और हिटलर जैसे सर्वसत्तावादी नेताओं तथा समाज के फ़ासीवादी मॉडल की बार-बार सराहना की। यह प्रभाव अभी तक चला आ रहा है (और इसकी वजह वे सामाजिक-आर्थिक कारण हैं जो अब तक मौजूद हैं)। मजेदार बात यह है कि स्‍वदेशी और देशप्रेम की चिल्‍ल-पों मचाने वाले लोग, खुद विदेशों से राजनीतिक-और-सांगठनिक विचार लेकर आए या उनके स्‍पष्‍ट प्रभाव में रहे हैं।

हिंदुत्‍ववादी नेताओं ने फासीवाद, मुसोलिनी और इटली की तारीफ में 1924-34 के बीच 'केसरी' में ढेरों संपादकीय व लेख प्रकाशित किए। संघ के संस्‍थापकों में से एक मुंजे 1931 में मुसोलिनी से मिल कर आया था। और वहीं से लौट कर ''हिंदू समाज'' के सैन्‍यीकरण का खाका तैयार किया। इस संबंध में 'इकोनॉमिकल एंड पोलिटिकल वीकली' के जनवरी 2000 अंक में मारिया कासोलारी का शोधपरक लेख प्रकाशित किया गया था, जिसमें कासोलारी ने आर्काइव/दस्‍तावेजों से प्रमाण प्रस्‍तुत किए हैं। इस लेख में बताया गया है कि किस तरह सावरकर से लेकर गोलवलकर तक ने हिटलर द्वारा यहूदियों के नरसंहार की सराहना की थी। यह शोध हिंदुत्‍व बिग्रेड पर हिटलर-मुसोलिनी के स्‍पष्‍ट प्रभाव और विचारों से लेकर तौर-तरीकों घृणा फैलाने वाले प्रचार तंत्र तक में विदेशी फासिस्‍टों की नकल को तथ्‍यों सहित साबित करता है। आमतौर पर संघी संगठनों के प्रचार से भले ही यह समझा जाता है कि हिंदू महासभा और संघ करीबी नहीं रहे, विशेषकर सावरकर के समय में उन्‍होंने संबंद्ध विच्‍छेद कर दिया था; लेकिन कासोलारी ने तथ्‍यों-सबूतों के साथ प्रमाणित किया है कि वे कभी अलग नहीं हुए। और दोनों ही समय समय पर हिटलर द्वारा नस्‍लीय सफाए को जायज ठहराते रहे और भारत में भी उसी से प्रेरणा लेने की बात करते रहे।
मारिया कासोलारी के उस लेख का अनुवाद हमारे एक ब्‍लॉगर साथी कर रहे हैं। अनुवाद होते ही हम उसे पोस्‍ट के रूप में प्रकाशित करेंगे (फिलहाल अंग्रेजी में यह लेख नीचे दिया गया है)। हम ऐसी स्रोत सामग्रियों को प्रकाशित करने का प्रयास जारी रखेंगे, यदि आपके पास ऐसी कोई सामग्री हो तो हमें सूचित करें।

सन 47 को याद करते हुए — केदारनाथ सिंह की कविता


(1947 में हमारे दिलों पर एक लकीर—बल्कि चीरा—खींच दिया गया था। दुनिया की बड़ी ताकत और उनकी छोटे साझीदारी ताकतों द्वारा देश के आम अवाम को जर्बदस्‍ती हिन्‍दुस्‍तान और पाकिस्‍तान नाम के दो मुल्‍क में बांट दिया गया था। उनके फायदे उनके लिए थे। लेकिन इंसानियत ने इस फायदे का खूनी नुकसान झेला। लाखों लोगों का विस्‍थापन और हजारों का कत्‍ल...। विभाजन आज भी धर्म के नाम पर खेले जाने वाले खेल की सिहरा देने वाली याद ताजा कर देता है। धर्म से ऊपर लोगों के आपसी रिश्‍तों के यूं टूट जाने को केदारनाथ सिंह की यह कविता बेहद भावप्रवण तरीके से उभारती है...। आइये याद करें 47 के उस मंजर को।)


सन 47 को याद करते हुए

— केदारनाथ सिंह


तुम्‍हें नूर मियां की याद है केदारनाथ सिंह?

गेहुंए नूर मियां

ठिगने नूर मियां

रामगढ़ बाजार से सुर्मा बेचकर

सबसे अखीर में लौटने वाले नूर मियां

क्‍या तुम्‍हें कुछ भी याद है केदारनाथ सिंह?

तुम्‍हें याद है मदरसा

इमली का पेड़

इमामबाड़ा

तुम्‍हें याद है शुरू से अखीर तक

उन्‍नीस का पहाड़ा

क्‍या तुम अपनी भूली हुई स्‍लेट पर

जोड़-घटाकर

यह निकाल सकते हो

कि एक दिन अचानक तुम्‍हारी बस्‍ती को छोड़कर

क्‍यों चले गये थे नूर मियां

क्‍या तुम्‍हें पता है

इस समय वे कहां हैं

ढाका

या मुल्‍तान में?

क्‍या तुम बता सकते हो

हर साल कितने पत्ते गिरते हैं

पाकिस्‍तान में?

तुम चुप क्‍यों हो केदारनाथ सिंह

क्‍या तुम्‍हारा गणित कमजोर है?

अच्‍छे नागरिक कभी भी नहीं करते प्रतिरोध — विजयबहादुर सिंह की कविता

'चरणदास चोर' नाटक पर रोक लगने पर कुछेक लोगों के लिखने-बोलने के अलावा आमतौर पर चुप्‍पी छाई हुई है। लगता है अब तमाम प्रतिष्ठित प्रगतिशीलों के लिए हबीव के नाटक पर रोक लगने का विरोध करना भी दायरे से बाहर की चीज हो गया है। सांप्रदायिकता के विरोध पर बड़े-बड़े भाषण देने वाले ऐसे तमाम लोगों पर विजयबहादुर की यह कविता सीधे-सादे शब्‍दों में तीखी बात कह दे रही है...


अच्‍छे नागरिक

— विजयबहादुर सिंह



अच्‍छे नागरिक


चुप रहते और बर्दाश्‍त करते हैं



अच्‍छे नागरिक


अपने मतलब से मतलब रखते हैं



अच्‍छे नागरिक


गवाह नहीं होते बुरी बात के



अच्‍छे नागरिक


कभी भी नहीं करते प्रतिरोध

सिमी के नाम पर


आज हम प्रसिद्ध सांप्रदायिकता विरोधी एक्टिविस्‍ट और आईआईटी मुंबई के पूर्व प्रोफेसर राम पुनियानी का लेख 'बर्बरता के विरुद्ध' पर दे रहे हैं। हालांकि, मैं श्री पुनियानी के सर्वधर्म सम्‍भाव वाले विचारों से सहमत नहीं हूं, और मेरा मानना है कि फासीवाद से लड़ाई के लिए धर्मनिरपेक्षता को सही अर्थों में स्‍थापित करना होगा, जोकि सर्वधर्म सम्‍भाव कत्‍तई नहीं होती। लेकिन ऐसे समय में जब इमरान हाशमी द्वारा अपने साथ भेदभाव किए जाने के आरोप के बहाने मुस्लिम आबादी के प्रति पक्षपात पर बहस चल रही हो, आम मुस्लिम आबादी के साथ भेदभाव और दुर्व्‍यवहार की बानगी पेश करता यह लेख कुछ सच्‍चाइयों पर प्रकाश डालता है।(हालांकि, इमरान हाशमी को गुजरात दंगों, मुंबई के दंगों में आम मुस्लिम आबादी के मारे जाने से कोई वास्‍ता नहीं होता, न ही उन्‍हें बहुसंख्‍यक मुसलमान आबादी के पिछड़ेपन, अशिक्षा, गरीबी की चिंता है। खैर, इस पर चर्चा फिर कभी...।) इस लेख का अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद हमारे साथी कामता प्रसाद जी ने किया है। : बर्बरता के विरुद्ध

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सिमी के नाम पर

राम पुनियानी


जुलाई (2009) के तीसरे हफ्ते में महाराष्‍ट्र पुलिस ने पुसाद, अकोला और आसपास के इलाकों से बहुत से मुसलमानों को इस आरोप में गिरफ्तार किया कि वे नये नाम के तहत सिमी को फिर से खड़ा कर रहे हैं। इस बात को हुए काफी अर्सा बीत चुका है जबकि हमने यह सुना था कि सिमी के नाम पर गिरफ्तारी हो रही है। साध्‍वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर की मोटरसाइकिल के मालेगांव में पाये जाने के पक्‍के सबूत के साथ मुस्लिम युवाओं की गिरफ्तारी का पहले का चक्र टूटा था। मुस्लिम युवाओं की गिरफ्तारी हरेक विस्‍फोट मसलन मालेगांव, हैदराबाद में मक्‍का मस्जिद, जयपुर और अन्‍य स्‍थानों के विस्‍फोट के बाद रोजमर्रा का मामला बन गया था। मोटरसाइकिल की कड़ी स्‍वामी दयानंद पांडेय, ले. कर्नल श्रीकांत पुरोहित और आरएसएस विचारधारा के समर्थक या उससे प्रेरित दक्षिणपंथी संगठनों से जुड़े दूसरे बहुत से लोगों तक लेकर गयी थी।
अब तक के अधिकतर विस्‍फोटों के बाद विस्‍फोटों में हाथ होने के आरोप में गिरफ्तार मुस्लिम युवाओं को महीनों तक यातना दी जाती रही है और फिर सबूत के अभाव में छोड़ दिया जाता रहा है। यह कमोबेश आये दिन की बात हो गयी थी और इसने समूचे मुस्लिम समुदाय को एकदम से डरा रखा है। इस मनमानी और आधारहीन गिरफ्तारियों के चलते बहुत से मुस्लिम युवाओं का कैरियर तबाह हो गया। बहुत से अल्‍पसंख्‍यक परिवारों को गंभीर समस्‍याओं का सामना करना पड़ा, उन्‍हें उनके अपने समुदाय ने छोड़ दिया और वह भी सिर्फ इस कारण कि वे एकबार इस तरह के आरोपों के दायरे में आ गये थे जिन्‍हें कि प्रचलित पूर्वाग्रहों एवं घिसी-पिटी सोच के आधार पर लगाया गया था न कि किसी ठोस तथ्‍य के आधार पर। सिमी को उस मूलभूत संगठन के रूप में माना जाने लगा है जो कि युवाओं के जरिये उपद्रव खड़ा करने के लिए जिम्‍मेदार है। 2001 में सिमी पर पाबंदी के बावजूद मुस्लिम युवाओं पर सिमी का कार्यकर्ता होने का लेबल चस्‍पा किया जाता रहा है और उन्‍हें सीखचों के पीछे ठूंसा जाता रहा है।
हमारे कहने का मतलब यह नहीं है कि सिमी की विचारधारा ऐसी है जो कि लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की बात करती है। हम जानते हैं कि जमात-ए-इस्‍लामी हिंद के विद्यार्थी मोर्चे के रूप में शुरू हुई सिमी धीरे-धीरे उसके नियंत्रण से बाहर होती गयी और विशेषकर 1990 के दशक में रेडिकल बन गयी। जाने-माने इस्‍लामिक विद्वान योगिंदर सिकंद इस संगठन का बहुत दिलचस्‍प ब्‍योरा प्रदान करते हैं। सिमी की स्‍थापना मौलाना मौदुदी के विचारों के आधार पर हुई है जिसके अनुसार समस्‍त गैर-मुस्लिम काफिर हैं और लोकतंत्र जैसी मानवनिर्मित व्‍यवस्‍थाएं झूठी हैं और जीवन जीने का एकमात्र ढंग शरिया है। इसने मुस्लिम विद्यार्थियों के मध्‍य इस्‍लामिक चेतना के प्रसार और गैर-मुस्लिमों के मध्‍य शांतिपूर्ण मिशनरी कामों का लक्ष्‍य रखा। 1990 के दशक की कुछ घटनाएं उसकी विचारधारा को रेडिकल और मिलिटैंट दिशा में ले गयीं। ये घटनाएं थीं अफगानिस्‍तान पर सोवियत रूस का आक्रमण और विशेषकर पाकिस्‍तान का इस्‍ला‍मीकरण।
इस बीच, जमात-ए-इस्‍लामी ने अपनी मार्गदर्शक विचारधारा के रूप में लोकतंत्र एवं धर्मनिरपेक्षता को स्‍वीकार कर लिया। सिमी एक दूसरी भाषा में बात करने के चलते अपने मूल संगठन के नियंत्रण से बाहर चली आयी। बाबरी मस्जिद विध्‍वंस और इसके बाद की हिंसा ने नकारात्‍मक दिशा में उसे प्रोत्‍साहन प्रदान किया। उसने कहा कि लोकतंत्र मुस्लिमों की रक्षा करने में विफल रहा इसलिए सोमनाथ को तबाह-बर्बाद करने वाले मोहम्‍मद गजनी जैसे किसी व्‍यक्ति की जरूरत है।

बाबरी विध्‍वंस के पश्‍चात उनके द्वारा जारी पोस्‍टर की थीम भी यही थी। यह आरोप लगा कि सिमी के सिख एवं कश्‍मीरी उग्रवादियों के साथ संबंध हैं। यह आरोप लगा कि उसका ओसामा और आईएसआई के साथ संबंध है। इसी समय सिमी ने दावा किया कि वह शांतिपूर्ण तरीकों के जरिये काम करना चाहती है, जबकि खराब होती सांप्रदायिक स्थिति ने उसे यह कहने को मजबूर किया कि मुस्लिम शांति चाहने वाला समुदाय है। इन्‍हीं परिस्थितियों में 2001 में सिमी पर प्रतिबंध लगा दिया गया। सिमी पर प्रतिबंध को चुनौती दी गयी, अत: प्रतिबंध की समीक्षा करने के लिए पंचाट की नियुक्ति करनी पड़ी।

तहलका के अजित साही ने अपनी कष्‍टसाध्‍य खोजबीन में पंचाट की सभी सुनवाई का फॉलो-अप किया (तहलका, सिमी फिक्‍शंस, 12 अगस्‍त 2008)पंचाट को संगठन पर प्रतिबंध लगाने के लिए उसके खिलाफ लगाये गये आरोपों का कोई साक्ष्‍य नहीं मिला। प्रतिबंध की पुष्टि नहीं की जा सकी। इस छानबीन के बारे में अजित साही ने कहा, ''उनकी छानबीन बेजान अदालती दस्‍तावेजों से उत्‍पन्‍न कोई नीरस स्‍टोरी नहीं है। यह दिल को झकझोर कर रख देने वाली स्‍टोरी है। मुश्किल से युवा लग रहे बच्‍चों के माथे पर नींदरहित रातों के कारण परेशानी छायी हुई है और वे पिता, भाई को जेल भेजे जाने की चिंता से ग्रस्‍त है। वे लगातार सोच रहे हैं, ''क्‍या इसका खात्‍मा होगा? क्‍या इसका कारण सचमुच में जायज है? अब मैं कहां जाऊं, क्‍या मैं इसे झेल पाऊंगा? वह आगे कहते हैं, ''मैंने ढेर सारे मुस्लिमों से बात की और मैंने खुद से हैरान होकर पूछा अगर यह सब मेरे साथ होता तो? मेरा भाई, मेरा बाप अगर जेल में होता तो?''

अमेरिकी मदद से पाकिस्‍तान में स्‍थापित मदरसों में प्रशिक्षित कट्टरपंथी इस्‍लामपंथियों की वजह से विश्‍व परिदृश्‍य इस्‍लाम और मुस्लिमों के खिलाफ होता जा रहा है और इसी के साथ ही जनमानस औसत मुस्लिम को आतंकवादी के रूप में देखता है और पुलिस मशीनरी इसी समझदारी पर काम करती है। यहां तक कि जब दर्जनों जीवन बर्बाद हो रहे थे और मुस्लिम समुदाय का अत्‍यधिक उत्‍पीड़न हो रहा था तो सरकार ने छानबीन के उस ढंग-ढर्रे को ठीक करने के लिए कुछ भी नहीं किया जिसका कि पुलिस अपने काम में अनुसरण कर रही थी।

इस स्थिति से व्‍यग्र होकर मानवाधिकार समूहों द्वारा दो जन पंचाटों की स्‍थापना की गयी। दो पंचाटों की रिपोर्ट और सिफारिशें एक जैसी हैं और दोनों में काफी कुछ एक समान हैं। पहले का नेतृत्‍व जस्टिस (सेवानिवृत्‍त) भार्गव और सरदार अली खान ने किया। असगर अली इंजीनियर और प्रशांत भूषण जैसे जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता उसकी जूरी में थे। गवाहियां दर्शाती हैं कि बड़ी संख्‍या में निर्दोष मुस्लिमों को पुलिस द्वारा इस आरोप के साथ निशाना बनाया गया कि वे देश-भर के विभिन्‍न आतंककारी कार्रवाइयों से सम्‍बद्ध हैं।
यह खासकर महाराष्‍ट्र, गुजरात, मध्‍यप्रदेश, आंध्रप्रदेश और राजस्‍थान में हुआ, हालांकि यह इन्‍हीं राज्‍यों तक सीमित नहीं रहा। आतंककारी अपराधों की छानबीन की आड़ में मुस्लिमों का उत्‍पीड़न और उन्‍हें शैतान बनाकर पेश करने का बहुत ही गंभीर मनोवैज्ञानिक असर न केवल उनके परिवार के लोगों के ऊपर बल्कि समुदाय के अन्‍य लोगों पर भी पड़ा। यह असुरक्षा एवं अलगाव का गहरा बोध उनमें भरता जा रहा है जो कि देश के लिए डरावने परिणाम पैदा कर सकता है।

राजस्‍थान के संगठनों के भिन्‍न समूह द्वारा स्‍थापित दूसरे पंचाट ने जस्टिस (सेवानिवृत्‍त) भार्गव के नेतृत्‍व में काम किया। एक विचार-योग्‍य टिप्‍पणी यह थी कि आतंककारी अपराधों की छानबीन कर रहे पुलिस अधिकारियों ने छानबीन करने के दौरान देश के समस्‍त कानूनों एवं सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश का उल्‍लंघन किया। खासकर, बहुत से लोगों की गिरफ्तारी दिखाये बगैर और उन्‍हें मजिस्‍ट्रेट के सामने पेश किये बिना कई दिनों या हफ्तों तक बंदी बनाकर रखा गया। पुलिस अधिकारियों ने उन्‍हें यातना दी और अपमानित किया। उन्‍हें अपने परिजनों एवं वकीलों से मिलने नहीं दिया गया। उनके परिजनों को यह खबर भी नहीं लगने दी गयी कि उन्‍हें बंदी बनाया गया है। पुलिस द्वारा विस्‍फोटों की छानबीन भी सांप्रदायिकता से प्रेरित जान पड़ती है और केवल मुस्लिम समुदाय से संबंध रखने वाले लोगों को ही छानबीन का निशाना बनाया गया।

एचयूजेआई और सिमी के नामों को पुलिस ने विस्‍फोटों को अंजाम देने वाले के रूप में उछाला पर बिना किसी सबूत और गवाह के। सिमी के अनेक पूर्व सदस्‍यों को बिना किसी आधार या साक्ष्‍य के गिरफ्तार किया गया और बंदी बनाया गया। मीडिया पुलिस के बयान को बार-बार दुहरा रहा था और मुस्लिम समुदाय से जुड़े लोगों एवं संगठनों के नाम को लोगों के सामने ला रहा था। इस प्रकार से हिंदुत्‍व संगठनों के द्वारा हिंदू समुदाय के दिलो-दिमाग में इस्‍लाम का भय पैदा किया जा रहा था।

इनमें से सैकड़ों लोगों को विस्‍फोटों के बाद उठा लिया गया और विधि-सम्‍मत प्रक्रिया अपनाये बिना और उन्‍हें अपनी भारतीय नागरिकता बताने का अवसर दिये बिना जबरिया न्‍यू जलपाईगुड़ी और फिर बांग्‍लादेश भेज दिया गया। इसका परिणाम जयपुर के नस्‍ली सफाये में सामने आया है।

हमें नहीं पता कि प्रशासन कितनी गंभीरता के साथ इस जन पंचाटों को लेता है लेकिन, तथ्‍य तो यह है कि उन्‍होंने समाज की ठोस वास्‍तविकताओं को सामने लाने का काम किया है। यह जरूरी है कि सरकार इन रिपोर्टों पर गंभीरतापूर्वक गौर करे और जांच अधिकारियों को अपनी पहुंच में और अधिक पेशेवर होने और अल्‍पसंख्‍यक समुदाय के साथ व्‍यवहार करते समय अपने पूर्वाग्रहों को छोड़ देने का निर्देश दे।

धर्म, सांप्रदायिकता और धर्म-निरपेक्षता : गोरख पाण्‍डेय (भाग दो)

'धर्म-निरपेक्षता' शब्‍द को उसके असली अर्थ में समझने की ज़रूरत आज पहले से ज्‍यादा मौजूद हैं। चूंकि इसी शब्‍द की आड़ में खोखली धर्म-निरपेक्षता गढ़ी और इस्‍तेमाल की गई वहीं सांप्रदायिकता के विरोध के लिए भी इसी गत्ते की तलवार का इस्‍तेमाल तथाकथित प्रगतिशील तबका करता आ रहा है। नतीजे भी सामने हैं जबकि आज सांप्रदायिकता के विरोध का कोई सशक्‍त वैचारिक-राजनीतिक-सामाजिक आधार मौजूद नहीं है। कल की पोस्‍ट की सबसे जरूरी बात हमें यह समझ आई कि ''धर्म-निरपेक्षता राज्‍य का एक गुण होना चाहिए।' राज्‍य के इस मूल चरित्र पर ध्‍यान देने की जरूरत है। इस मूल बात को समझते हुए प्रस्‍तुत है लेख के इस हिस्‍से का दूसरा और अंतिम भाग। इस लेख की अहमियत की वजह से हम इसे जल्‍द ही पूरा प्रस्‍तुत करेंगे, साथ ही इस मुद्दे पर तो बात जारी ही रहेगी...



धर्म, सांप्रदायिकता और धर्म-निरपेक्षता


— गोरख पाण्‍डेय


इस स्थिति का फायदा उठा कर कुछ लोग धर्म-निरपेक्षता की जरूरत से ही इनकार करने लगे हैं। वे कहते हैं कि भारत धर्म और सम्‍प्रदायों का देश है और धर्म-निरपेक्षता यहां की प्रकृति के अनुकूल नहीं है। उनके तर्क पर चला जाए तो हमें यूरोप से प्राप्‍त आधुनिक विज्ञान, तकनालाजी तथा लोकतंत्र और समाजवाद की धारणाओं से भी मुक्‍त हो जाना चाहिए। ऐसी हालत में जो हमारे पास बच जायेगा, वह वर्गों और वर्णों में विभाजित, मध्‍य-युगीन और अस्‍पृश्‍यता के काले धब्‍बों से भरा जर्जर समाज होगा या फिर हिन्‍दू साम्‍प्रदायिकता के वर्चस्‍व से नियंत्रित एक ऐसा राज्‍य-तंत्र जो अपने मूल आशय में फासिज्‍म का भारतीय रूप होगा। साम्‍प्रदायिकता की विघटनकारी परिणतियों से परिचित कोई भी व्‍यक्ति इन दोनों विकल्‍पों को स्‍वीकार नहीं करेगा।


जहां तक परम्‍परा का सवाल है, भारत में धार्मिक और साम्‍प्रदायिक चिन्‍तन के अलावा, और उसके खिलाफ, बुद्धिवादी और भौतिकवादी चिनतन की एक मजबूत परंपरा रही है। बुद्ध के समय में चिन्‍तन के तमाम रूप सक्रिय थे और अधिकांश बुद्धिवादी तथा भौतिकवादी थे। खुद बुद्ध ने ईश्‍वर की धारणा का निषेध करके आत्‍मवादी चिंतन पर गंभीर प्रहार किया। चाणक्‍य का प्रसिद्ध अर्थशास्‍त्र अपनी मूल संरचना में एक धर्म-निरपेक्ष कृति है। बाद में मुगल बादशाह अकबर ने एक खास तरह की धर्म-निरपेक्षता बरतने की कोशिश की। असली मुद्दा यह है कि आप परम्‍परा में से क्‍या चुनते हैं और वर्तमान में आपका पक्ष क्‍या है?


अब समय आ गया है कि धर्म-निरपेक्षता को उसके स‍ही परिप्रेक्ष्‍य में देखा जाये और जनता की एकता तथा उसके जनवादी आन्‍दोलन के सामने खतरा बन रही तानाशाही और सांप्रदायिकता की शक्तियों का मुकाबला किया जाए।


धर्म, सांप्रदायिकता और धर्म-निरपेक्षता : गोरख पाण्‍डेय

धर्म-निरपेक्षता क्‍या है? या हमारे यहां सेक्‍युलरिज्‍म सांप्रदायिकता से लड़ते हुए इतना खोखला, नकली और निरीह क्‍यों नजर आता है? इसकी वजह हमें यह समझ आती है कि धर्म-निरपेक्षता को उसके असली अर्थों में हमने ग्रहण ही नहीं किया। प्रगतिशील कहे जाने वाले तबके ने भी उसकी उसी परिभाषा (सर्वधर्मसमभाव वाली) को आंख मूंद कर स्‍वीकार कर लिया जो शासक वर्ग की जरूरतों के हिसाब से गढ़ी गयी थी। हम चाहते हैं कि धर्म-निरपेक्षता के असली अर्थ और उसके मूल्‍यों पर नये सिरे से समझ बनाये जाने की जरूरत है। इस समझ के लिए जरूरी बहस-मुबाहिसे के लिए हम यहां गोरख पाण्‍डेय का इस विषय पर एक महत्‍वपूर्ण लेख धर्म, सांप्रदायिकता और धर्म-निरपेक्षता, (साभार परिवेश पत्रिका) के अंतिम हिस्‍से का पहला भाग दे रहे हैं। हम उम्‍मीद करते हैं कि धर्म-निरपेक्षता को उसके असली अर्थ में समझने की एक ईमानदार शुरुआत की जाएगी...



धर्म, सांप्रदायिकता और धर्म-निरपेक्षता


— गोरख पाण्‍डेय



धर्म-निरपेक्षता क्‍या है? क्‍या यह सर्वधर्मसमभाव है? क्‍या आप धार्मिक भी बने रह सकते हैं और धर्म-निरपेक्ष भी? कोई भी धार्मिक व्‍यक्ति या व्‍यक्तियों का समूह सर्वधर्मसमभाव के अर्थ में धर्म-निरपेक्ष नहीं हो सकता। क्‍योंकि उसका अपना एक धर्म है और उसके लिए दूसरे धर्म पराये हैं। असल में धार्मिकता और धर्म-निरपेक्षता एक साथ नहीं चल सकतीं।


यूरोप के आधुनिक इतिहास पर गौर करें तो पायेंगे कि वहां इसकी धारणा सीधे धर्म के विरोध में विकसित हुई। दूसरे लोक की कल्‍पना को नकारना और इस लोक या यथार्थ को इसी के नियमों के आधार पर व्‍याख्‍यायित करना चिन्‍तन का इहलौकिकीकरण (सेक्‍युलराइजेशन) माना गया।


इस अर्थ में धर्म-निरपेक्षता चिन्‍तन की वह प्रवृत्ति है जो विज्ञान और बुद्धिवाद के आधार पर विकसित होती है, अनुभव, तर्क और प्रयोग पर बल देती है और धार्मिक चिन्‍तन की अबौद्धिक पारलौकिकता का निषेध करती है। इसके साथ यूरोप के इतिहास का यह तथ्‍य भी जुड़ा हुआ है कि मध्‍य-युग में राज्‍य के ऊपर धर्म (चर्च) की स्‍थापित सत्ता को चुनौती देना और राज्‍य के समस्‍त इहलौकिक क्रिया-कलाप से धर्म को अलग कर देना भी क्रमश: धर्म-निरपेक्षता का एक रूप बन गया। धर्म-निरपेक्षता राज्‍य के एक गुण के रूप में विकसित हुई जिसके अनुसार वह धर्म को व्‍यक्तिगत सरोकार मानेगा, सामाजिक संबंधों से धर्म को अलग करेगा और धर्म के आधार पर किसी को विशेषाधिकार न प्रदान करेगा। इसका आशय यह भी है कि धर्म-निरपेक्ष राज्‍य अपनी विचारधारा निर्मित और प्रचारित करेगा, बुद्धि और तर्क को प्रोत्‍साहन देगा और धार्मिक चेतना के आग्रहों को अप्रासंगिक बनाता जायेगा।


अपने देश में धर्म-निरपेक्षता की जो परिभाषा फैलायी गयी, वह धार्मिकता के ज्‍यादा करीब थी। इसे सर्वधर्मसमभाव या धर्मो से समान सापेक्षता के रूप में लिया जाता है। इस परिभाषा के अनुसार हमारा शासक वर्ग किसी भी या सभी धर्मो को समान रूप से प्रोत्‍साहन देकर सांप्रदायिकता की ताकतों को मजबूत करता है और उनसे वोट की लगातार भ्रष्‍ट होती गयी राजनीति की शतरंज खेलता है।


(लेख के अंतिम हिस्‍से का दूसरा भाग कल की पोस्‍ट में)



'बर्बरता के विरुद्ध' के लिए हेडर तैयार किया रवि कुमार जी ने


हमारे मित्र रविकुमार ने, जो 'सृजन और सरोकार' ब्‍लॉग के संचालक भी हैं, 'बर्बरता के विरुद्ध' के हेडर के लिए एक रेखांकन तैयार किया है। उन्‍होंने कुछ और भी रेखाचित्र भेजे हैं जिन्‍हें हम अगली पोस्‍टों के साथ इस्‍तेमाल करेंगे। हम साथी रविकुमार के आभारी हैं। फ़ासीवाद के विरुद्ध इस ब्‍लॉग के लिए और मित्र भी अपने या अन्‍य देशी-विदेशी चित्रकारों के स्‍केच, पेंटिंग, ग्राफ़ि‍क आदि भेज सकते हैं। इनकी एक चित्र दीर्घा इस ब्‍लॉग पर शुरू की जा सकती है...