सांप्रदायिकता-धार्मिक कट्टरपंथ के खिलाफ दस्‍तावेज

इंटरनेट खंगालने के दौरान मुझे सांप्रदायिकता और धार्मिक कट्टरपंथ के खिलाफ स्रोत के रूप में एक दस्‍तावेज मिला है, जिसमें इन विषयों पर पुस्‍तकों, लेखों, और फिल्‍मों, पत्रिकाओं, गानों आदि की सूची दी गई है। 'बर्बरता के विरुद्ध' के पाठकों को फ़ासीवाद, धार्मिक कट्टरपंथ आदि के खिलाफ लड़ाई में स्रोत सामग्री मुहैया कराने के उद्देश्‍य से इसकी पीडीएफ फाइल का लिंक उपलब्‍ध करा रहा हूं। यह दस्‍तावेज फरवरी 94 से लेकर जनवरी 95 के दौरान आल्‍टरनेटिव इंडिया इंडेक्‍स के सहयोग से Women Living Under Muslim Laws Research And Documentation Unit ने तैयार किया था। इसके बाद संभवत: दस्‍तावेज का कोई और संस्‍करण नहीं आया। नवीनतम संस्‍करण की तलाश कर रहा हूं, लेकिन तब तक इस दस्‍तावेज से भी मदद मिल सकती है। 161 पृष्‍ठ का यह संपूर्ण दस्‍तावेज इस लिंक से प्राप्‍त किया जा सकता है।

जानिए फ़ासीवाद के कारणों और उससे लड़ने के तरीकों को -4

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बिगुल अखबार के ब्‍लॉग से अभिनव के फासीवाद संबंधी लेख को यहां हूबहू प्रस्‍तुत कर रहा हूं। इसमें फासीवाद के कारणों और आधार की तफसील से चर्चा की गई है। संभवत: यह लेख दो अंकों में आना है, इसलिए इस ब्‍लॉग पर फिलहाल इसका एक ही हिस्‍सा उपलब्‍ध है, उसी को यहां किस्‍तों में प्रस्‍तुत कर रहा हूं। आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा। विचारों में मतभेद जरूर दर्ज कर सकते हैं, लेकिन कुछ ''देशभक्‍त'' सिर्फ गाली-गलौज करना जानते हैं! इसलिए गाली-गलौज भरी उनकी टिप्‍पणियों को तुरंत डिलीट कर दिया जाएगा।

इतिहास गवाह है कि संकट के दौरों में, जब संसाधनों की 'कमी' (क्योंकि यह वास्तविक कमी नहीं होती, बल्कि मुनाफ़ा-आधारित व्यवस्था द्वारा पैदा की गयी कृत्रिम कमी होती है) होती है, तभी धार्मिक और जातीय अन्तरविरोध और टकरावों के पैदा होने और बढ़ने की सम्भावना सबसे ज़्यादा होती है। अगर जनता के सामने वर्ग अन्तरविरोध साफ़ नहीं होते और उनमें वर्ग चेतना की कमी होती है तो उनके भीतर किसी विशेष धर्म या सम्प्रदाय के लोगों के प्रति अतार्किक प्रतिक्रियावादी ग़ुस्‍सा भरा जा सकता है और उन्हें इस भ्रम का शिकार बनाया जा सकता है कि उनकी दिक्कतों और तकलीफ़ों का कारण उस विशेष सम्प्रदाय, जाति या धर्म के लोग हैं। आज जिस तरह वैश्विक संकट के दौर में दुनिया भर में बेरोज़गारी तेज़ी से बढ़ी है उसी प्रकार 1930 के दशक की मन्दी के समय भी दुनिया भर में बेरोज़गारी तेज़ी से बढ़ी थी। शहरी ग़रीबों की संख्या में भारी बढ़ोत्तरी हुई थी। जिन देशों में औद्योगिक विकास का एक लम्बा और गहरा इतिहास था वहाँ पूँजीवादी विकास के कारण आम मेहनतकश जनता के उजड़ने की प्रक्रिया एक क्रमिक प्रक्रिया थी जो धीरे-धीरे और कई किश्तों में पूरी हुई। लेकिन जर्मनी में औद्योगिक विकास 1860-70 के पहले बेहद कम था जो राष्ट्रीय एकीकरण के बाद द्रुत गति से हुआ और उसने गाँवों में ग़रीब किसानों को और शहरों में आम मेहनतकश आबादी को इतनी तेज़ गति से उजाड़ा कि पूरे समाज में एक भयंकर असुरक्षा और अनिश्चितता का माहौल पैदा हुआ। जर्मनी में भी शहरी बेरोज़गारी, और शहरी और ग्रामीण ग़रीबी में तेज़ी से वृद्धि हुई थी। अतिवादी नस्लवाद, सम्प्रदायवाद, या जातीयतावाद अक्सर आर्थिक और सामाजिक तौर पर उजड़े हुए लोगों के जीवन को एक 'अर्थ' प्रदान करने का काम करते हैं। यही कारण है कि ऐसे समाजों में जहाँ पूँजीवादी विकास क्रान्तिकारी प्रक्रिया के ज़रिये नहीं हुआ, जहाँ पूँजीवादी विकास की प्रक्रिया इतिहास के एक लम्बे दौर में फैली हुई प्रक्रिया के रूप में नहीं मौजूद थी, बल्कि एक असमान, अधूरी, और अजीब तरीक़े से द्रुत अराजक प्रक्रिया के रूप में घटित हुई, वहाँ फ़ासीवाद के सामाजिक आधार समाज में पैदा हुए। जर्मनी में औद्योगीकरण की प्रक्रिया बहुत देर से शुरू हुई। इंग्लैण्ड में औद्योगिक क्रान्ति की शुरुआत 1780 के दशक में हो गयी थी। फ्रांस में 1860 आते-आते औद्योगिक क्रान्ति का एक दौर पूरा हो चुका था। दूसरी तरफ़, इस समय तक जर्मनी एक एकीकृत देश के रूप में सामने तक नहीं आ पाया था। जर्मन एकीकरण के बाद एक जर्मन राष्ट्र राज्य अस्तित्व में आया। बिस्मार्क के नेतृत्व में पूँजीवादी विकास की शुरुआत हुई। जर्मनी में राष्ट्रीय पैमाने पर पूँजीवाद का विकास ही तब शुरू हुआ जब विश्व पैमाने पर पूँजीवाद साम्राज्यवाद, यानी कि एकाधिकारी पूँजीवाद, के दौर में प्रवेश कर चुका था। एकाधिकारी पूँजीवाद प्रकृति और चरित्र से ही जनवाद-विरोधी होता है। जर्मनी में पूँजीवादी विकास बैंकों की पूँजी की मदद से शुरू हुआ और उसका चरित्र शुरू से ही एकाधिकारी पूँजीवाद का था। नतीजतन, जर्मनी में पूँजीवाद का विकास 1880 के दशक से ही इतनी तेज़ गति से हुआ कि 1914 आते-आते वह यूरोप का सबसे आर्थिक वृद्धि दर वाला देश बन गया जिसका औद्योगिक उत्पादन अमेरिका के बाद सबसे अधिक था। लेकिन किसी जनवादी क्रान्ति के रास्ते पूँजीवाद के न आने के कारण समाज में जनवाद की ज़मीन हमेशा से ही कमज़ोर थी। जर्मनी के एक आर्थिक महाशक्ति के तौर पर उदय के बाद विश्व पैमाने पर साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्द्धा का तीव्र होना लाज़िमी था। उस समय ब्रिटेन दुनिया की सबसे बड़ी साम्राज्यवादी शक्ति था और उसका औपनिवेशिक साम्राज्य सबसे बड़ा था। जर्मनी विश्व पैमाने पर लूट का नये सिरे से बँटवारा करना चाहता था। जर्मनी की यह साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा विश्व को पहले विश्वयुद्ध की तरफ़ ले गयी।


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जानिए फ़ासीवाद के कारणों और उससे लड़ने के तरीकों को -3

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बिगुल अखबार के ब्‍लॉग से फासीवाद संबंधी लेख को यहां हूबहू प्रस्‍तुत कर रहा हूं। इसमें फासीवाद के कारणों और आधार की तफसील से चर्चा की गई है। संभवत: यह लेख दो अंकों में आना है, इसलिए इस ब्‍लॉग पर फिलहाल इसका एक ही हिस्‍सा उपलब्‍ध है, उसी को यहां किस्‍तों में प्रस्‍तुत कर रहा हूं। आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा। विचारों में मतभेद जरूर दर्ज कर सकते हैं, लेकिन कुछ ''देशभक्‍त'' सिर्फ गाली-गलौज करना जानते हैं! इसलिए गाली-गलौज भरी उनकी टिप्‍पणियों को तुरंत डिलीट कर दिया जाएगा।
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अब तक हमने उन आर्थिक प्रक्रियाओं के बारे में पढ़ा जिनके नतीजे के तौर पर वे स्थितियाँ पैदा होती हैं जो फ़ासीवाद को भी जन्म दे सकती हैं। कोई ज़रूरी नहीं है कि ये आर्थिक परिस्थितियाँ अनिवार्य रूप से फ़ासीवाद को जन्म दें। फ़ासीवाद के उभार को रोका जा सकता है या नहीं, यह काफ़ी कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि संकटपूर्ण परिस्थिति का कोई क्रान्तिकारी विकल्प मौजूद है या नहीं। यदि क्रान्तिकारी विकल्प मौजूद नहीं होगा तो जनता को प्रतिक्रिया के रास्ते पर ले जाना फ़ासीवादी ताक़तों के लिए आसान हो जायेगा। इस परिप्रेक्ष्य में भगतसिंह का वह कथन बरबस ही याद आता है जिसमें उन्होंने कहा था कि जब गतिरोध की स्थिति लोगों को अपने शिकंज़े में जकड़ लेती है तो इंसानियत की रूह में क्रान्तिकारी स्पिरिट पैदा करने की ज़रूरत होती है, वरना प्रतिक्रियावादी शक्तियाँ जनता को ग़लत रास्ते पर ले जाने में सफल हो जाती हैं।

इस सामान्य रूपरेखा के बाद जर्मनी और इटली में फ़ासीवाद के उदय की स्थितियों और प्रक्रियाओं पर निगाह डालना उपयोगी होगा। जर्मनी फ़ासीवाद के उदय, विकास और सशक्तीकरण का सबसे प्रातिनिधिक उदाहरण है। हालाँकि इटली में फ़ासीवाद सत्ता में जर्मनी के मुक़ाबले पहले आया, लेकिन जर्मनी ही वह देश था जहाँ फ़ासीवादी उभार सबसे गहरे तक जड़ जमाये और ज़बरदस्त था। इसलिए हम अपना विश्लेषण जर्मनी से ही शुरू करते हैं।

जर्मनी में फ़ासीवाद


फ़ासीवादियों के बारे में अक्सर एक मिथक लोगों के दिमाग़ में होता है कि वे असांस्कृतिक, सनकी, झक्की होते हैं। जर्मनी का उदाहरण दिखलाता है कि फ़ासीवादियों की रफ़्तार में कोई पागलों या सनकियों की भरमार नहीं थी। बल्कि वहाँ बेहद पढ़े-लिखे लोगों की तादाद मौजूद थी जो समानता, जनवाद और आज़ादी के उसूलों के बेहद सचेतन विरोधी थे। जर्मनी में फ़ासीवादियों को तमाम सामाजिक तबकों से समर्थन प्राप्त था। इनमें नौकरशाह वर्ग, कुलीन वर्ग और पढ़े-लिखे अकादमिकों (विश्वविद्यालय, कॉलेज, स्कूल के टीचर, लेखक, पत्रकार, वकील आदि) की अच्छी-ख़ासी संख्या शामिल थी। 1934 में क़रीब एक लाख लोगों को हिटलर की हत्यारी सेना 'आइन्त्साज़ग्रुप्पेन' ने या तो गिरफ्र्तार कर लिया था, या यातना शिविरों में भेज दिया था या फ़ि‍र मार डाला था। आपको जानकर ताज्जुब होगा कि आइन्त्साज़ग्रुप्पेन के अधिकारियों का एक-तिहाई हिस्सा विश्वविद्यालयों से डिग्री प्राप्त किये हुए लोगों का था।

जर्मनी में फ़ासीवाद को बड़े उद्योगपतियों से ज़बदरस्त समर्थन प्राप्त था। पूँजीपति वर्ग के जिस हिस्से ने हिटलर की राष्ट्रीय समाजवादी मज़दूर पार्टी (नात्सी पार्टी) को सबसे पहले समर्थन दिया था, वह था घरेलू भारी उद्योगों का मालिक पूँजीपति वर्ग। बाद में पूँजीपति वर्ग के दूसरे सबसे बड़े हिस्से निर्यातक पूँजीपति वर्ग ने भी हिटलर को अपना समर्थन दे दिया। और इसके बाद उद्योग जगत के बचे-खुचे हिस्से ने भी नात्सी पार्टी को समर्थन दे दिया। इसके कारण साफ़ थे। हिटलर की नीतियों का सबसे ज़्यादा फ़ायदा बड़े पूँजीपति वर्ग को होना था। वैश्विक संकट के दौर में मज़दूर आन्दोलन की शक्ति को खण्डित करके अपनी सबसे प्रतिक्रियावादी, सबसे नग्न और सबसे क्रूर तानाशाही को लागू करने के लिए जर्मनी के बड़े पूँजीपति वर्ग को जिस राजनीतिक समूह की ज़रूरत थी, वह था नात्सी पार्टी, जो पूँजीवाद से पैदा हुई आर्थिक-सामाजिक असुरक्षा के कारण निम्न पूँजीपति वर्गों, मध्यम वर्गों और मज़दूर वर्ग के एक हिस्से में पनपने वाली प्रतिक्रिया का इस्तेमाल करके एक ग़ैरजनवादी, तानाशाह सत्ता स्थापित कर सके। ज़ाहिर है, इस प्रतिक्रिया का निशाना किसी न किसी को बनाना था और जर्मनी में नात्सी पार्टी ने प्रतिक्रिया का निशाना जिन्हें बनाया वे थे नस्लीय अल्पसंख्यक, विशेष रूप से यहूदी, मज़दूर व ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता (जिन्हें नात्सी पार्टी ने आर्थिक असुरक्षा और ठहराव का ज़िम्मेदार ठहराया) और कम्युनिस्ट। नात्सी पार्टी का फ़ासीवादी शासन अन्तिम विश्लेषण में निश्चित रूप से बड़े वित्तीय और औद्योगिक पूँजीपति वर्ग की तानाशाही का नग्नतम और क्रूरतम रूप था। इसे एक छोटे-से उदाहरण से समझा जा सकता है। जर्मन उद्योगपतियों ने नात्सी शासन के दौरान अपने कारख़ानों में ग़ुलामों से जमकर श्रम करवाया, जो कहने की आवश्यकता नहीं कि फ़ासीवादी राज्य उन्हें मुफ्र्त में मुहैया कराता था। ये दास श्रम करने वाले लोग थे हिटलर द्वारा यातना शिविरों में भेजे गये यहूदी, मज़दूर, ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता और कम्युनिस्ट। आम ग़ुलाम मज़दूर की औसत आयु मात्रा तीन महीने थी। तीन महीने इस क़ि‍स्‍म का श्रम करने के बाद उनकी मौत हो जाया करती थी। इस ग़ुलाम श्रम का इस्तेमाल करने वाली कम्पनियों में आज के जर्मनी की तमाम प्रतिष्ठित कम्पनियाँ शामिल थीं, जैसे वोल्क्सवैगन और क्रुप। ये सिर्फ़ दो उदाहरण हैं। इस घिनौने कृत्य में जर्मनी के तमाम बड़े पूँजीपति शामिल थे। इन अमानवीय कृत्यों के विरुद्ध लड़ने वाले लोग अधिकांश मामलों में कम्युनिस्ट थे। कम्युनिस्टों को ही सबसे बर्बर दमन का भी सामना करना पड़ा।

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'अब संसार में ''हिन्‍दू राष्‍ट्र'' नहीं हो सकता...' — गणेशशंकर विद्यार्थी

हमारे देश में सांप्रदायिकता से लड़ने वाले अग्रजों की कतार में निस्‍संदेह सबसे ऊपर शहीद गणेशशंकर विद्यार्थी का नाम लिया जा सकता है। वे हमें याद दिलाते हैं कि अपने विचारों के लिए जीना क्‍या होता है और प्रतिबद्धता के मायने क्‍या होते हैं। एक ऐसे दौर में जबकि मानवता के खिलाफ मानवद्रोही सांप्रदायिक ताकतें नये सिरे से महाविनाश की तैयारियों में लगी हैं, और दूसरी ओर इसके विरोध की प्रतिबद्धता का वैचारिक ठोसपन कमजोर हो रहा है, यह जरूरी हो जाता है कि प्रतिबद्धता के उदाहरण के तौर पर विद्यार्थीजी जैसे लोगों को इतिहास के पन्‍नों से निकाल कर आंखों के ऐन सामने रखा जाए, ताकि उनके विचारों की प्रेरणा हमें वर्तमान और भविष्‍य की चुनौतियों के लिए मार्ग दिखाती रहें....
प्रस्तुत है उनका यह छोटा सा उद्धरण...'अब संसार में ''हिन्दू राष्ट्र'' नहीं हो सकता...'‍‍

आज कुछ लोग ''हिन्‍दू राष्‍ट्र हिन्‍दू राष्‍ट्र'' चिल्‍लाते हैं। हमें क्षमा किया जाये—यदि हम कहें—नहीं; हम इस बात पर जोर दें कि वे एक बड़ी भारी भूल कर रहे हैं। और उन्‍होंने अभी तक ''राष्‍ट्र'' शब्‍द के अर्थ ही नहीं समझे। हम भविष्‍यवक्‍ता नहीं, पर अवस्‍था हमसे कहती है कि अब संसार में ''हिन्‍दू राष्‍ट्र'' नहीं हो सकता, क्‍योंकि राष्‍ट्र का होना उसी समय सम्‍भव है जब देश का शासन देशवालों के हाथ में हो। और यदि मान लिया जाये कि आज भारत स्‍वाधीन हो जाये या इंग्‍लैंड उसे औपनिवेशिक स्‍वराज्‍य दे दे, तो भी हिन्‍दू ही भारतीय राष्‍ट्र के सब कुछ न होंगे। और जो ऐसा समझते हैं—ह्रदय से या केवल लोगों को प्रसन्‍न करने के लिए—वे भूल कर रहे हैं और देश को हानि पहुंचा रहे हैं।
—साभार राहुल फाउण्‍डेशन, लखनऊ से प्रकाशित 'चुनी हुई रचनाएं' गणेशशंकर विद्यार्थी

प्रो. सभ्‍भरवाल की हत्‍या पर हत्‍यारों का क्रूर अट्टहास और विष्‍णु नागर की कविता

हत्‍यारे जश्‍न मना रहे हैं। इंसाफ उनकी जेब में जो है। कॉलेज में सैकड़ों लोगों के सामने प्रो. सभ्‍भरवाल को मारने वाले एबीवीपी के प्रदेश अध्‍यक्ष और सचिव सबूतों के अभाव में अदालत से बरी हो गये। जज ने माना कि इंसाफ नहीं हो पाया। इंसाफ हो भी कैसे सकता है जज महोदय, इस व्‍यवस्‍था में खूनी हत्‍यारे भी लोकतंत्र की आड़ में सत्ता तक पहुंचने के लिए आजाद हैं। इस मामले में वहां की भाजपा सरकार और उसकी गुण्‍डा परिषद ने सिर्फ प्रो. सभ्‍भरवाल को ही नहीं मारा बल्कि यह भी दिखाया कि फासीवादी ताकतें अदालतों और कानूनों का किस तरह मजाक उड़ा देती हैं। बहरहाल, आदरणीय कवि श्री विष्‍णु नागर की प्रस्‍तुत कविता इस बात को एकदम उघाड़ कर सपाट ढंग से बयान कर रही है...

हत्‍यारों का आदेश
हत्‍यारों का आदेश है
हमें न सिखाये कोई मानवता
हम हैं ही मानवीय
हम पहले मारते हैं
गोली आदमी की जांघों में
वह फिर भी दौड़ता है
तो उसकी पसलियों में
फिर भी नहीं मानता
तो मारते हैं
उसके कपाल पर

जलाने के लिए लकड़ी,
घी वगैरह अरथी के लिए चार आदमी
हमीं जुटाते हैं
हम खुद भी दो मिनट का मौन रखने
तफरीहन चले आते हैं

छुपे हुए हिटलरों से सावधान रहो - नागार्जुन

कवि उदयप्रकाश के योगी आदित्‍यनाथ के हाथों सम्‍मान लेने की खबर पर आजकल एक बहस ब्‍लॉगजगत में चल रही है। विचारशून्‍यता के इस दौर में यह बहस भी सांप्रदायिकता के खतरे पर किसी गंभीर विमर्श की बजाय निम्‍न कोटि की थुक्‍का-फजीहत में तब्‍दील हो चुकी है। होना तो यह चाहिए था कि इस बहाने सांप्रदायिकता-विरोध की गिरावट पर कोई सार्थक चर्चा चलती। खैर हम नागार्जुन की एक प्रसिद्ध कविता दे रहे हैं, जो आज के 'हिटलरों' के छुपे हुए नाखूनों और पंजों से सचेत रहने की बात करती है...। खासकर ऐसे दौर में जब फासीवाद चुपचाप अपना काम कर रहा है, उसके असली चरित्र को पलभर के लिए भी न भूलने और उससे ज्‍यादा सावधान रहने की जरूरत होती है।

हिटलर के तम्‍बू में
अब तक छिपे हुए थे उनके दांत और नाखून
संस्‍कृति की भट्ठी में कच्‍चा गोश्‍त रहे थे भून।
छांट रहे थे अब तक बस वे बड़े-बड़े कानून।
नहीं किसी को दिखता था दूधिया वस्‍त्र पर खून।
अब तक छिपे हुए थे उनके दांत और नाखून।
संस्‍कृति की भट्ठी में कच्‍चा गोश्‍त रहे थे भून।
मायावी हैं, बड़े घाघ हैं,उन्‍हें न समझो मंद।
तक्षक ने सिखलाये उनको 'सर्प-ऩृत्‍य' के छंद।
अजी, समझ लो उनका अपना नेता था जयचंद।
हिटलर के तम्‍बू में अब वे लगा रहे पैबन्‍द।
मायावी हैं, बड़े घाघ हैं, उन्‍हें न समझो मंद।